Friday, December 27, 2013

मेरा "मैं" तो न जाने  कब
हथेलियों से फिसल गया 
उसके टुकड़े शायद महफूज़ हैं 
तुम्हारी आँखों के कोनों में

मेरा "मैं" जीवन के भगोने पर
ढक्कन की तरह चढ़ा था
कुछ भी छलकने नहीं देता था

आज तुम्हारी आँखों में तूफ़ान उठता है
तो मन का कोना कोना भीग जाता है

मुझे किसी "मैं" से कोई ख़ास मुहब्बत नहीं
बस मन भीगता है तो ठिठुर जाता है
तुम्हारे इश्क़ की आँच तलाशता है
तुम्हारी आँखों में
अपने वज़ूद के टुकड़े ढूंढ़ता है 

Wednesday, October 2, 2013

हर दिन जब सूरज सुबह सुबह
एक फूंक मार जगाता है
और तुम्हारे पहलू में
अलसायी आँखें खुलती हैं

हम देर तलक सांसें रोके
बस तुमको देखा करते हैं
और धीरे-धीरे हर पल को
मन की किताब में लिखते हैं
यादों की शक्लें देते हैं

****
जब पास नहीं होते हो तुम
उन रंग उड़ी सी यादों को
एक सपनों की अलमारी में
तह कर कर के रखते हैं

और जब तब मन की कुण्डी खोल
घंटों उनको सीने से
चिपका कर सोया करते हैं
उन भूले बिसरे लम्हों की
कोई खुशबू ढूँढा करते हैं





Thursday, September 19, 2013

मेरा "मैं" और तुम्हारा "तुम"

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

नहीं, कोई भ्रम नहीं पालता
कि तुम्हें उसकी ज़रुरत है

बस थोड़ा अकेला है
(किसी समुदाय का हिस्सा नहीं)
इसीलिए तुम्हारे संगठित समुदाय में
सेंध लगाता है

सेंध लगाता है
क्योंकि जब तुम्हारे दर्द की भाषा बोलता है
तुम्हारे दर्द में अपने आपको डुबोता है
तभी सांस ले पाता है

जब तुम अपने दर्द की भाषा से
रोज़मर्रा के शब्दों को निकाल देते हो
सिर्फ अपने 'समुदाय' लिए नया शब्दकोष गढ़ते हो
तो मेरा 'मैं' अपने दर्द को बेज़ुबान पाता है

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

Thursday, September 5, 2013

Meri Sabse Priya Adhyaapika ke liye II

क्या क्या सहेज कर रखूँ
किन शब्दों को, किन यादों को
शब्द तो अपने अर्थ भी नहीं संभाल पाते
और यादें बस हलक तक आकर रुक जाती हैं
किन तस्वीरों में आपको तलाशूँ
तसवीरें कुछ ज़्यादा ही परायी लगती हैं

बरसों पहले जब आपकी ऊँगली थामी थी
तो मन के अबोध विश्वास में
असंभव को संभव करने की क्षमता थी

विश्वास तो समय की घुरनी पर
अनवरत घूमता थक गया
और समय किसी बहुरूपिये सा
नए वेश धरता रहा
नए झंझावात खड़े करता रहा

आज मेरे और आपके बीच का फासला
शब्दों से, यादों से, तस्वीरों से पूरा नहीं पड़ता

Thursday, June 27, 2013

कई बार सपने में 
ज़िन्दगी से कुछ गायब सा हो जाता है 
सपने में ही हाथ-पैर मारती हूँ 
समझने की कोशिश करती हूँ 
कि जागती आँखों से जो ज़िन्दगी 
perfect मालूम पड़ती थी 
अचानक इतनी उलझ कैसे गयी 
कौन सी कड़ी, कहाँ से टूट कर 
कहाँ गुम हो गयी 
एक छोर को दूसरे से 
मिलाने की कोशिश में 
रात बीत जाती है
और सपना भी 
थक कर, हार कर 
जब ज़िन्दगी के compromise को 
स्वीकार कर लेती हूँ 
तब सुबह की पहली धूप 
आँखों पर पड़ती है 

Wednesday, May 29, 2013

मैंने अपना खिज़र बदल लिया है

थोड़ा कमज़ोर सा है
पर झूठे वादे नहीं करता
न परीकथाओं से स्वप्न दिखाता है
न किसी सच के चीथड़े ओढ़
क्रान्ति की दुहाई देता है

थोड़ा कमज़ोर सा है
पर जानता है कि कमज़ोर है
न खुद भ्रम में जीता है
न दूसरों को बाध्य करता है
लड़ता है, जीतता है, हारता है

*****

मैंने अपना खिज़र बदल लिया है

क्योंकि बरसों जिसकी दहलीज़ पर सजदे किये
वो मेरा नहीं है
शायद किसीका नहीं है
सिवाए अपनी ताकत के
जिसे वह हाथ से जाने नहीं देता

इस अंधी दुनिया की ख़िलाफ़त करता है
पर उसके आँखों की पट्टी उतरने नहीं देता
कितने आंसूं और कितनी मुहब्बत
उसकी बादशाहत बरकरार रखेंगी
यह तय करता है

*****

मैंने अपना खिज़र बदल लिया है

इस उम्मीद में नहीं कि
एक दिन वह मेरे पुराने पैग़म्बर को हरा देगा
बल्कि इसलिए क्योंकि अब
मेरे सजदे मुझे खुद लिखने हैं
मेरे आंसू मुझे खुद भरने हैं

क्योंकि मुझे उम्मीद के हथियार से
से कोई लड़ाई नहीं लड़नी
क्योंकि मुझे अब किसी पैग़म्बर से
उसके शर्तों पे
मुहब्बत या नफ़रत नहीं करनी 

Monday, March 4, 2013

जब मिलोगे तो फुर्सत से समझाना
क्या मिला तुम्हें
सरेआम मेरा तमाशा बना कर

और ये भी समझाना
कि बनायी क्यूँ कर
ये बर्बाद सी दुनिया

नहीं रखना मेरे लिए
कोई जगह
किसी जन्नत या जहन्नुम में

ग़र सब कुछ है
तुम्हारी ही तख्लीक़ 
तो बताना कि कहाँ जाएँ तुमसे दूर


Tuesday, February 19, 2013


मेरी दुनिया का सच
तुम्हारी बपौती नहीं
न तुम्हारी देवमूर्ति की
आँख से गिरा पानी है
मेरे सच ने सुन्दर होना
सदियों पहले छोड़ दिया...
****

Wednesday, January 30, 2013

भूलते हैं शब्द
शब्दों में कहीं तुम कैद हो
क्या बताएँ
बस तुम्हारी साँस को सुनते रहे

तुम्हारी अधलिखी, अधसुनी
बेजान सी कहानियों से
ज़िन्दगी में रोज़
जिंदा मायने भरते रहे






Friday, January 25, 2013

कुछ बोलो ऐसा कि 
जी उठूँ 
कुछ तो बोलो ऐसा 
कि  लगे 
मैं एक चलती-फिरती लाश नहीं हूँ

कुछ बोलो ऐसा 
कि  मेरे आस पास का शोर 
ख़त्म हो जाए 
मैं तुम्हें 
और तुम मुझे सुन पाओ 

ज़बान से, हाथों से, आँखों से 
कुछ तो बोलो ऐसा

Thursday, January 24, 2013

कहीं कुछ तो सुगबुगाहट सी है
कुछ है जो
धीरे धीरे हिलता डुलता है
कुछ कहने की कोशिश करता है

कहीं पीछे मुड़ कर देखता है
लहराते हुए हाथ
लहुलुहान पैर
बरसों से जागी हुई आँखें

कुछ शब्द जो पराये हो गए हैं
उन्हें सुनने, समझने, बोलने की
कोशिश करता है

कुछ तो है
जो जिंदा है
जिंदा रहना चाहता है

Saturday, January 12, 2013

मेरी कविता और मेरे शब्द मर रहे  हैं
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है

जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी  करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है


अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की


एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है