Thursday, September 19, 2013

मेरा "मैं" और तुम्हारा "तुम"

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

नहीं, कोई भ्रम नहीं पालता
कि तुम्हें उसकी ज़रुरत है

बस थोड़ा अकेला है
(किसी समुदाय का हिस्सा नहीं)
इसीलिए तुम्हारे संगठित समुदाय में
सेंध लगाता है

सेंध लगाता है
क्योंकि जब तुम्हारे दर्द की भाषा बोलता है
तुम्हारे दर्द में अपने आपको डुबोता है
तभी सांस ले पाता है

जब तुम अपने दर्द की भाषा से
रोज़मर्रा के शब्दों को निकाल देते हो
सिर्फ अपने 'समुदाय' लिए नया शब्दकोष गढ़ते हो
तो मेरा 'मैं' अपने दर्द को बेज़ुबान पाता है

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

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