क्या क्या सहेज कर रखूँ
किन शब्दों को, किन यादों को
शब्द तो अपने अर्थ भी नहीं संभाल पाते
और यादें बस हलक तक आकर रुक जाती हैं
किन तस्वीरों में आपको तलाशूँ
तसवीरें कुछ ज़्यादा ही परायी लगती हैं
बरसों पहले जब आपकी ऊँगली थामी थी
तो मन के अबोध विश्वास में
असंभव को संभव करने की क्षमता थी
विश्वास तो समय की घुरनी पर
अनवरत घूमता थक गया
और समय किसी बहुरूपिये सा
नए वेश धरता रहा
नए झंझावात खड़े करता रहा
आज मेरे और आपके बीच का फासला
शब्दों से, यादों से, तस्वीरों से पूरा नहीं पड़ता
किन शब्दों को, किन यादों को
शब्द तो अपने अर्थ भी नहीं संभाल पाते
और यादें बस हलक तक आकर रुक जाती हैं
किन तस्वीरों में आपको तलाशूँ
तसवीरें कुछ ज़्यादा ही परायी लगती हैं
बरसों पहले जब आपकी ऊँगली थामी थी
तो मन के अबोध विश्वास में
असंभव को संभव करने की क्षमता थी
विश्वास तो समय की घुरनी पर
अनवरत घूमता थक गया
और समय किसी बहुरूपिये सा
नए वेश धरता रहा
नए झंझावात खड़े करता रहा
आज मेरे और आपके बीच का फासला
शब्दों से, यादों से, तस्वीरों से पूरा नहीं पड़ता

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