Saturday, January 12, 2013

मेरी कविता और मेरे शब्द मर रहे  हैं
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है

जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी  करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है


अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की


एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है




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