मेरी कविता और मेरे शब्द मर रहे हैं
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है
जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है
अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की
एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है
जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है
अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की
एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है

No comments:
Post a Comment