Tuesday, September 30, 2014

तुम्हारे लिए...

जाने किस पल में तारों ने 
मिल कर रच डाला गीत नया
मेरी ही कविता के सारे 
स्वप्नों और शब्दों को चुन कर

अब किन शब्दों में मैं तुमसे
अपने मन की हर बात कहूँ 
और किन स्वप्नों के तारों को बुन कर 
मन का संसार रचूँ  

Tuesday, July 8, 2014

अंधे युग की आधी कविता में
सीमित युग का इतिहास हुआ
इस युग की छलना,
युग की रचना बन रचती है द्यूत नया

गढ़ती है एक अदृश्य व्यवस्था
सारे शब्दों और अर्थों को
और काट फेंकती है रचना से
मतभेदों के अंशों को

कुछ  शब्द नए, सन्दर्भ नए
इन एकतरफ़ा संवादों में
मैं द्वंद्व ढूँढने निकली हूँ
शब्दों की छुपी दरारों में

Tuesday, May 13, 2014

मृत्ति से आकाश तक
जो कुछ रहा
वह इक अकेला
सत्य तो शायद न था...
एक सत्य
मेरे भी हृदय में
सांस लेता,
ढूंढता कुछ,
पलता रहा...
*****
तुम किसी
आदिम इहा को ढूंढते,
मानस पटल पर
नित नया इतिहास लिखते
बढ़ चले...
और शेष जो था
वो मेरे अंतस में
अंकित सत्व तेरा,
फूलता-फलता रहा...

Wednesday, May 7, 2014

मुझे ऐसी जगह ले चलो 
जहाँ उम्मीद खत्म हो जाये 
और नाउम्मीदी को 
बस बख़्श दिया  जाये

मुझे ऐसी जगह ले चलो
जहाँ टूटे सपनों की परतें 
थोड़ी-थोड़ी कर अपने जिस्म से उतार सकूँ 
और हिम्मत का मुखौटा भी न लगाना पड़े 

मुझे ऐसी जगह ले चलो 
जहाँ बस एक बार थक कर, टूट कर बैठ सकूँ 
और खुद को या किसी और को 
कोई जवाब न देना पड़े 

मुझे ऐसी जगह ले चलो 
जहाँ रोऊँ तो अन्दर सब खाली हो जाये 
किसी दर्द, किसी मुहब्बत का 
कोई नामोनिशान न रह जाये 

Sunday, February 2, 2014

लेखनी

मेरी लेखनी से इतना सारा सच न माँग
उलझन में पड़ जाती है

व्यक्ति का दर्द देखती है
समुदाय की कथा सुनाती है

जिन शब्दों को समुदाय ने गढ़ा
जिनके अर्थ निर्धारित किये,
उन शब्दों को दुहराती है

जब शब्दों में
दर्द पूरा नहीं पड़ता
उनकी लोरी बना कर
चेतना को सुलाती है

मेरी लेखनी से इतना सारा सच न माँग
उलझन में पड़ जाती है

पूछते हो, अपने शब्द क्यों नहीं गढ़ती?
अपना दर्द क्यों नहीं लिखती ?

मेरा दर्द तो
अलग-अलग समुदायों के
नए-नए शब्दों में बँटता गया
छितराता गया

मेरी लेखनी तुमसे
किसी सच का वादा नहीं करती
बस इस छितराये हुए दर्द को
शब्दों में समेटती जाती है

Wednesday, January 22, 2014

Nine parts of desire - Umm Ghada aur us benaam qaidi ke naam

मैं उम्म गादा से मिलना चाहती हूँ
पूछना चाहती हूँ
कि कैसे जुटाई उसने ताकत
अपने बच्चों के जले हुए टुकड़े बटोरने की
कैसे जुटाया इतना धीरज
कि बिना टूटे हर उस इंसान को दिखा सके
युद्ध का सच
जो गोलियाँ चलने की
बम गिरने की
इंसानों के टुकड़े-टुकड़े होने की
किसी भी वज़ह से वकालत करता है

सधे हुए शब्दों में
ज़िंदा क़ब्रगाहों की कहानी सुना सके
****

मैं उस बेनाम क़ैदी से मिलना चाहती हूँ
जिसे महीने के उन चार दिनों के लिए
बिना कपड़ों के
उल्टा लटका दिया जाता है
और उसके जिस्म के साथ-साथ
उसकी आत्मा भी
अपने ही खून में तर-बदर होती रहती है

मैं उससे कुछ पूछना नहीं चाहती
बस उसकी आँखों में
जीवन के कण ढूंढ़ना चाहती हूँ
ताकि फिर से मेरे कलम की बेचैनी
या उसका दर्द
थक न जाए
फिर से मैं ये ग़लतफ़हमी न पाल लूँ
कि ख़ुदा 'मेरी' नहीं सुनता



भैया के लिये....

कहीं दूर,
स्मृति के सभी पड़ावों  के परे
तुम आज भी मुस्कराते हो
देखते हो अधखुली आँखों से
मानो एक स्वप्न जी रहे हो
और एक अज्ञात भाषा में,
अपनी कथा सुनाते हो
तुम्हारी भाषा जब नहीं समझ पाती 
तब अपने मायने खुद ही गढ़ लेती हूँ 
ज़िन्दगी के हर नए पड़ाव पर 
तुम्हारी ही कहानी के नए मायने l 
अब इतना नहीं चुभता 
मायनों का बदलना 
तुम्हारा हमारे जीवन में हो कर भी नहीं होना 

****
बस कुछ लम्हे हैं 
जो यादों के फ़लक पर 
चिपक से गए हैं 
ज़िन्दगी के मायने बन गए हैं 
जैसे वह लम्हा
जब तुमने बात ख़त्म नहीं की थी 
और मैंने तुम्हारा फ़ोन काट दिया था 
अब इतना दर्द नहीं होता ये सोच कर 
कि फिर कभी फ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ नहीं आयी 
अब इतना नहीं चुभता 
तुम्हारी आवाज़ को सहेज कर नहीं रख पाना 

****

Monday, January 13, 2014

मैं पूरे चाँद की दुहिता
बैठी बस दर्शक बन
देखूँ विद्रूप नया नित
द्वंद्व नया नित
भीषण कलरव जीवन का

हाँ दो ईश्वर तो निश्चित हैं
बसते हैं अंतस में
रचते  हैं
रजनी की छलना
मैं पूरे चाँद की दुहिता