Wednesday, January 22, 2014

भैया के लिये....

कहीं दूर,
स्मृति के सभी पड़ावों  के परे
तुम आज भी मुस्कराते हो
देखते हो अधखुली आँखों से
मानो एक स्वप्न जी रहे हो
और एक अज्ञात भाषा में,
अपनी कथा सुनाते हो
तुम्हारी भाषा जब नहीं समझ पाती 
तब अपने मायने खुद ही गढ़ लेती हूँ 
ज़िन्दगी के हर नए पड़ाव पर 
तुम्हारी ही कहानी के नए मायने l 
अब इतना नहीं चुभता 
मायनों का बदलना 
तुम्हारा हमारे जीवन में हो कर भी नहीं होना 

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बस कुछ लम्हे हैं 
जो यादों के फ़लक पर 
चिपक से गए हैं 
ज़िन्दगी के मायने बन गए हैं 
जैसे वह लम्हा
जब तुमने बात ख़त्म नहीं की थी 
और मैंने तुम्हारा फ़ोन काट दिया था 
अब इतना दर्द नहीं होता ये सोच कर 
कि फिर कभी फ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ नहीं आयी 
अब इतना नहीं चुभता 
तुम्हारी आवाज़ को सहेज कर नहीं रख पाना 

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