Thursday, November 22, 2012

'Paash' ke liye....

वक़्त-बेवक़्त तुम्हारी आत्मा में सर उठाता विद्रोह
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कानों के परदे फाड़ डालने वाला, अल्फाजों से उठता शोर 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
दिल को हलक तक खींच लाती तुम्हारे उम्मीद की चीख 
सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

सबसे ख़तरनाक होता है 
सपनों के अस्थिपंजर को घूरना,
और पलकें झपकना भूल जाना 
सबसे ख़तरनाक होता है 
अपने और अपनों के लिए 
redundant हो जाना
फिर एक दिशा-हीन आंधी में
खुद को बहने देना
और अवचेतना का भ्रम पाल लेना 

सबसे खतरनाक वह शाबाशी होती है 
जो तुम्हारी हार के बाद भी 
तुम्हारी पीठ पर पड़ती है 
और घंटों तुम्हारे होठों पर 
हंसी बनकर बिखरी रहती है 

सबसे ख़तरनाक वह सन्नाटा होता है 
जो सूइयों की तरह चुभता है
और मन के vacuum में 
तुम्हारी सांसें टटोलता है

सबसे खतरनाक वह आइना होता है
जो हर सुबह तुमसे कहता है
कि तुम तैयार हो
जाओ एक मशीन के सामने बैठो
और किसी के दर्द की profiling करो
सबसे खतरनाक वह सुबह होती है
जो एक गहरी नींद लाती है
और तुम्हारे कानों में चुपके से गुनगुनाती है
'सो जा मुर्दे,
ये लड़ाई तो सपने में लड़ी जायेगी'


वक़्त-बेवक़्त तुम्हारी आत्मा में सर उठाता विद्रोह
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कानों के परदे फाड़ डालने वाला, अल्फाजों से उठता शोर 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
दिल को हलक तक खींच लाती तुम्हारे उम्मीद की चीख 
सबसे ख़तरनाक नहीं होती 



Wednesday, May 30, 2012


बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें

तपती धरती, तपती बूँदें
लह-लह जलता मन का आँगन
 
पिघली-पिघली इन बूंदों की
सेंक लगाता पिघला सा तन
 
किस मिट्टी की गोद में बरसे
या सीपी के होंठ को छू ले

बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें


 

Sunday, May 20, 2012

मैं क्यों साहित्य सुधा के
जीवन-रस का पान न कर पायी 
दर्शन  का  मर्म , विरह की पीड़ा 
क्यों श्रृंगार न लिख पायी
क्यों विभु के निर्मल आनन पर
एक रक्तिम रेख सदृश उभरे
क्यों त्याग वाक् की कोमलता
कविता की नस नस में बिफरे
क्यों अश्रु निरत नयनों की लाली
बन थर्राते रहे सदा
सदियों की कोई  द्रोह कथा
बस रहे सुनाते शब्द मेरे





मन  कैसे करे पार बोलो 
अनहद दुविधा की वैतरणी 
शंका की बढ़ती धूम -रेख 
प्रश्नों से विकल भीत रजनी 
किस ओर उलझ बैठा विवेक
किस ठौर बँधी  पीड़ा तन  की 
मैं किस  गिरिधर का ध्यान  करूँ 
अब कहाँ मिले संज्ञा मन  की






Wednesday, April 11, 2012

तुम इसी झंझा में 
बन आलोक मिलना 
मैं तुम्हारे दीप को
निज  अंजुलि में
धर अकम्पित 
चल पडूँगी 

पंथ रोके जो खड़े
वट वृक्ष उनको 
नमन मेरा
पर समर्पित 
वह्नि तुमको
मैं तुम्हारे संग जलूँगी 

कौन सा यह युद्ध
किसका यज्ञ है यह 
ज्ञात किसको 
बस तुम्हारी वेदना
और अश्रु के दो कण 
दिखाते राह सबको

उस अकल्पित के परे
द्रष्टव्य जो है
तुम उसी की ओर बढ़ना
मैं नए संग्राम के
निर्देश ले कर  
हे पथी तुमको मिलूँगी


Wednesday, April 4, 2012

तुम एक स्वप्न हो
जिसे मैंने पिछले दस सालों से
प्रति पल जिया है...
जिया है क्योंकि
स्वप्न बिखर जाते हैं
आँख खुलने के बाद...

कुछ तो था तुम में
कि तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे आस पास की दुनिया
समय के उस चौखटे में
बर्फ की तरह जम सी गयी
हम सब ने एक एक कर
अपने हिस्से के टुकड़ों को बटोरा
और अपने अन्दर की रुखी
सर्द ज़मीन पर सजा कर रख दिया
पिछले दस सालों से 
हर साल 
आज के दिन 
थोड़ी ठण्ड ज्यादा लगती है
उस रूखे, नीले पड़ गए हिस्से में
एक सूई चुभती है
और जीवन की कोशिकाएँ ढूँढती है

अब बातें नहीं याद आतीं
बस एक हँसी है
जो आँखों के सामने
चिपक सी गयी है...
एक स्पर्श है
जिसे मैं हर स्पर्श ढूँढती हूँ
और तुम्हारी नज़र है
जो आते-जाते अनगिनत चेहरों
से झाँकती है
मुस्करा कर ओझल हो जाती है...

तुम स्वप्न ही तो हो
सिर्फ नींद में दिखते हो
एक मूक सी भाषा में
कुछ कहते हो
हँसते हो
घूरते हो
और चुप हो जाते हो...




Wednesday, March 21, 2012

Meri sabse priy adhyapika ke liye

कुछ यादों की मैंने मूर्ति बना कर
मन-मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया है
कि पूजा की धूप-बाती
अंतस को सुरभित करती रहे

कुछ यादों को मैंने शब्दों में सहेज कर रखा है
कि कहीं कल एक दूसरे को देख न पायें
तो उन शब्दों से गीत लिखेंगे
इस उम्मीद के साथ कि
हमारे गीत एक दूसरे के कानों तक पहुँच सकें

कुछ यादों के मैंने गोटे और सितारे बनाये हैं
अपने ब्याह की ओढ़नी में टाँकने के लिए
ताकि आपका आशीर्वाद उनसे छन कर
मेरी मांग पर बरसे


कुछ यादों की मैंने ऊँगली थाम कर रखी है
इस भीड़ के छँटने तक,
फिर बैठेंगे आराम से
और ढेर सारी बातें करेंगे


कुछ यादों को बस याद बना कर
अपनी आँखों में रोक लिया है
कि जब एक अच्छी नींद आये
तो एक बार फिर से आपसे
अपने सपनों में  मिल लूँ...


Thursday, January 26, 2012

मुर्दा अल्फाज़ों में उलझी बात
धीरे धीरे सरक कर
तुम्हारे करीब आती है
तुम्हारे ज़हन पर हावी हो जाती है
उस भीगी रात की पेशानी पर
कुछ लकीरें बना जाती है
****
मुझे चिढ़ हो गयी है
उन अल्फाज़ों से
नज्मों से
जिन्हें मुस्कराना नहीं आता
और रोने में उनकी तौहीन होती है
जिनकी मनहूसियत
तुम्हारी रातों में उल्लू की तरह बोलती है



Thursday, January 19, 2012

paraya

एक पराये देश में 
एक पराया अजनबी
एक परायी जुबान बोलते बोलते 
आपके कानो में 
आपकी भाषा का एक शब्द कहता है
****
जाने कितनी देर तक
दो सृष्टियों में
दो अस्तित्व लेकर 
समय के दोनो पहियों को
काठ के एक तख्ते में 
जोड़ती रही
****
उस पराये देश का
वह पराया अजनबी
दूर, बहुत दूर 
अपने पराये कदम 
आपकी धरती पर रख रहा है
उसकी मिट्टी की खुशबु 
साँसों में भर रहा है