मैं क्यों साहित्य सुधा के
जीवन-रस का पान न कर पायी
जीवन-रस का पान न कर पायी
दर्शन का मर्म , विरह की पीड़ा
क्यों श्रृंगार न लिख पायीक्यों विभु के निर्मल आनन पर
एक रक्तिम रेख सदृश उभरे
क्यों त्याग वाक् की कोमलता
कविता की नस नस में बिफरे
क्यों अश्रु निरत नयनों की लाली
बन थर्राते रहे सदा
सदियों की कोई द्रोह कथा
बस रहे सुनाते शब्द मेरे

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