Wednesday, April 11, 2012

तुम इसी झंझा में 
बन आलोक मिलना 
मैं तुम्हारे दीप को
निज  अंजुलि में
धर अकम्पित 
चल पडूँगी 

पंथ रोके जो खड़े
वट वृक्ष उनको 
नमन मेरा
पर समर्पित 
वह्नि तुमको
मैं तुम्हारे संग जलूँगी 

कौन सा यह युद्ध
किसका यज्ञ है यह 
ज्ञात किसको 
बस तुम्हारी वेदना
और अश्रु के दो कण 
दिखाते राह सबको

उस अकल्पित के परे
द्रष्टव्य जो है
तुम उसी की ओर बढ़ना
मैं नए संग्राम के
निर्देश ले कर  
हे पथी तुमको मिलूँगी


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