Wednesday, January 22, 2014

Nine parts of desire - Umm Ghada aur us benaam qaidi ke naam

मैं उम्म गादा से मिलना चाहती हूँ
पूछना चाहती हूँ
कि कैसे जुटाई उसने ताकत
अपने बच्चों के जले हुए टुकड़े बटोरने की
कैसे जुटाया इतना धीरज
कि बिना टूटे हर उस इंसान को दिखा सके
युद्ध का सच
जो गोलियाँ चलने की
बम गिरने की
इंसानों के टुकड़े-टुकड़े होने की
किसी भी वज़ह से वकालत करता है

सधे हुए शब्दों में
ज़िंदा क़ब्रगाहों की कहानी सुना सके
****

मैं उस बेनाम क़ैदी से मिलना चाहती हूँ
जिसे महीने के उन चार दिनों के लिए
बिना कपड़ों के
उल्टा लटका दिया जाता है
और उसके जिस्म के साथ-साथ
उसकी आत्मा भी
अपने ही खून में तर-बदर होती रहती है

मैं उससे कुछ पूछना नहीं चाहती
बस उसकी आँखों में
जीवन के कण ढूंढ़ना चाहती हूँ
ताकि फिर से मेरे कलम की बेचैनी
या उसका दर्द
थक न जाए
फिर से मैं ये ग़लतफ़हमी न पाल लूँ
कि ख़ुदा 'मेरी' नहीं सुनता



भैया के लिये....

कहीं दूर,
स्मृति के सभी पड़ावों  के परे
तुम आज भी मुस्कराते हो
देखते हो अधखुली आँखों से
मानो एक स्वप्न जी रहे हो
और एक अज्ञात भाषा में,
अपनी कथा सुनाते हो
तुम्हारी भाषा जब नहीं समझ पाती 
तब अपने मायने खुद ही गढ़ लेती हूँ 
ज़िन्दगी के हर नए पड़ाव पर 
तुम्हारी ही कहानी के नए मायने l 
अब इतना नहीं चुभता 
मायनों का बदलना 
तुम्हारा हमारे जीवन में हो कर भी नहीं होना 

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बस कुछ लम्हे हैं 
जो यादों के फ़लक पर 
चिपक से गए हैं 
ज़िन्दगी के मायने बन गए हैं 
जैसे वह लम्हा
जब तुमने बात ख़त्म नहीं की थी 
और मैंने तुम्हारा फ़ोन काट दिया था 
अब इतना दर्द नहीं होता ये सोच कर 
कि फिर कभी फ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ नहीं आयी 
अब इतना नहीं चुभता 
तुम्हारी आवाज़ को सहेज कर नहीं रख पाना 

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Monday, January 13, 2014

मैं पूरे चाँद की दुहिता
बैठी बस दर्शक बन
देखूँ विद्रूप नया नित
द्वंद्व नया नित
भीषण कलरव जीवन का

हाँ दो ईश्वर तो निश्चित हैं
बसते हैं अंतस में
रचते  हैं
रजनी की छलना
मैं पूरे चाँद की दुहिता