Thursday, September 19, 2013

मेरा "मैं" और तुम्हारा "तुम"

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

नहीं, कोई भ्रम नहीं पालता
कि तुम्हें उसकी ज़रुरत है

बस थोड़ा अकेला है
(किसी समुदाय का हिस्सा नहीं)
इसीलिए तुम्हारे संगठित समुदाय में
सेंध लगाता है

सेंध लगाता है
क्योंकि जब तुम्हारे दर्द की भाषा बोलता है
तुम्हारे दर्द में अपने आपको डुबोता है
तभी सांस ले पाता है

जब तुम अपने दर्द की भाषा से
रोज़मर्रा के शब्दों को निकाल देते हो
सिर्फ अपने 'समुदाय' लिए नया शब्दकोष गढ़ते हो
तो मेरा 'मैं' अपने दर्द को बेज़ुबान पाता है

मेरा 'मैं'
तुम्हारे 'तुम' की काया में
नहीं उतर सकता
तुमसे मिटटी नहीं बदल सकता।

Thursday, September 5, 2013

Meri Sabse Priya Adhyaapika ke liye II

क्या क्या सहेज कर रखूँ
किन शब्दों को, किन यादों को
शब्द तो अपने अर्थ भी नहीं संभाल पाते
और यादें बस हलक तक आकर रुक जाती हैं
किन तस्वीरों में आपको तलाशूँ
तसवीरें कुछ ज़्यादा ही परायी लगती हैं

बरसों पहले जब आपकी ऊँगली थामी थी
तो मन के अबोध विश्वास में
असंभव को संभव करने की क्षमता थी

विश्वास तो समय की घुरनी पर
अनवरत घूमता थक गया
और समय किसी बहुरूपिये सा
नए वेश धरता रहा
नए झंझावात खड़े करता रहा

आज मेरे और आपके बीच का फासला
शब्दों से, यादों से, तस्वीरों से पूरा नहीं पड़ता