Wednesday, January 30, 2013

भूलते हैं शब्द
शब्दों में कहीं तुम कैद हो
क्या बताएँ
बस तुम्हारी साँस को सुनते रहे

तुम्हारी अधलिखी, अधसुनी
बेजान सी कहानियों से
ज़िन्दगी में रोज़
जिंदा मायने भरते रहे






Friday, January 25, 2013

कुछ बोलो ऐसा कि 
जी उठूँ 
कुछ तो बोलो ऐसा 
कि  लगे 
मैं एक चलती-फिरती लाश नहीं हूँ

कुछ बोलो ऐसा 
कि  मेरे आस पास का शोर 
ख़त्म हो जाए 
मैं तुम्हें 
और तुम मुझे सुन पाओ 

ज़बान से, हाथों से, आँखों से 
कुछ तो बोलो ऐसा

Thursday, January 24, 2013

कहीं कुछ तो सुगबुगाहट सी है
कुछ है जो
धीरे धीरे हिलता डुलता है
कुछ कहने की कोशिश करता है

कहीं पीछे मुड़ कर देखता है
लहराते हुए हाथ
लहुलुहान पैर
बरसों से जागी हुई आँखें

कुछ शब्द जो पराये हो गए हैं
उन्हें सुनने, समझने, बोलने की
कोशिश करता है

कुछ तो है
जो जिंदा है
जिंदा रहना चाहता है

Saturday, January 12, 2013

मेरी कविता और मेरे शब्द मर रहे  हैं
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है

जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी  करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है


अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की


एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है