ये जो हर बार तुम मेरी आग में
अपने हाथ सेकते-सेकते
हाथ पीछे खींच लेते हो
ये जो हर बार मेरा उन्माद
तुम्हारे माथे की शिकन बन जाता है
ये जो हर बार मेरी प्रीत
तुम्हारे नियमों की चारदीवारी लांघ कर
किसी अनजान देस में बरसने लगती है
मेरे मन में ये जाने कैसी
धुकधुकी लग जाती है
कि तुम 'तुम' नहीं
तुम अपने अनगिनत रूपों में भी
मानो अधूरे हो
कि मेरी आग को जाने कब तक
मेरे अन्दर ही जलना होगा
कि तुम्हारे 'तुम' के दरस की ये आस
जाने कितने युगों तक
मुझे सोने नहीं देगी
अपने हाथ सेकते-सेकते
हाथ पीछे खींच लेते हो
ये जो हर बार मेरा उन्माद
तुम्हारे माथे की शिकन बन जाता है
ये जो हर बार मेरी प्रीत
तुम्हारे नियमों की चारदीवारी लांघ कर
किसी अनजान देस में बरसने लगती है
मेरे मन में ये जाने कैसी
धुकधुकी लग जाती है
कि तुम 'तुम' नहीं
तुम अपने अनगिनत रूपों में भी
मानो अधूरे हो
कि मेरी आग को जाने कब तक
मेरे अन्दर ही जलना होगा
कि तुम्हारे 'तुम' के दरस की ये आस
जाने कितने युगों तक
मुझे सोने नहीं देगी

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