इस कविता को समझ में नहीं आ रहा
कि वह कहाँ से शुरू हो
स्कूल के पहले दिन से?
जब मैंने जिद की थी
मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना
या उन एकाकी पलों से
जब तुमने स्वयं को
एक अनन्त मौन में समेट लिया
और मैंने तुम्हारे साथ बिताये
हर लम्हे को
मन की डिबिया में सहेज कर
रखना शुरू किया
गाँधी और सरोजिनी नायडू से लेकर
सुन्दर काण्ड की अशोक वाटिका तक
लोकसभा चुनाव के परिणामों से लेकर
आलू-मेथी की सूखी सब्जी तक
तुम दोनों की खटपट से लेकर
प्रीत की अनन्य परिभाषा तक
सब कुछ तो बंद है
उस छोटी सी डिबिया में
मेरे आस पास की दुनिया ने
ढेर सारे आँसू बहा कर
एक दिन में तुम्हें भुला दिया
शुक्र है कि
मेरी डिबिया में तुमने आँसू नहीं दिए
शुक्र है कि
मेरे आंसुओं में
तुम्हारी यादें नहीं घुलेंगी
कि वह कहाँ से शुरू हो
स्कूल के पहले दिन से?
जब मैंने जिद की थी
मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना
या उन एकाकी पलों से
जब तुमने स्वयं को
एक अनन्त मौन में समेट लिया
और मैंने तुम्हारे साथ बिताये
हर लम्हे को
मन की डिबिया में सहेज कर
रखना शुरू किया
गाँधी और सरोजिनी नायडू से लेकर
सुन्दर काण्ड की अशोक वाटिका तक
लोकसभा चुनाव के परिणामों से लेकर
आलू-मेथी की सूखी सब्जी तक
तुम दोनों की खटपट से लेकर
प्रीत की अनन्य परिभाषा तक
सब कुछ तो बंद है
उस छोटी सी डिबिया में
मेरे आस पास की दुनिया ने
ढेर सारे आँसू बहा कर
एक दिन में तुम्हें भुला दिया
शुक्र है कि
मेरी डिबिया में तुमने आँसू नहीं दिए
शुक्र है कि
मेरे आंसुओं में
तुम्हारी यादें नहीं घुलेंगी
