Wednesday, December 28, 2011

Nana-nani ke liye

इस कविता को समझ में नहीं आ रहा
कि वह कहाँ से शुरू हो
स्कूल के पहले दिन से?
जब मैंने जिद की थी
मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना
या उन एकाकी पलों से
जब तुमने स्वयं को
एक अनन्त मौन में समेट लिया
और मैंने तुम्हारे साथ बिताये
हर लम्हे को
मन की डिबिया में सहेज कर
रखना शुरू किया
गाँधी और सरोजिनी नायडू से लेकर
सुन्दर काण्ड की अशोक वाटिका तक
लोकसभा चुनाव के परिणामों से लेकर
आलू-मेथी की सूखी सब्जी तक
तुम दोनों की खटपट से लेकर
प्रीत की अनन्य परिभाषा तक
सब कुछ तो बंद है
उस छोटी सी डिबिया में

मेरे आस पास की दुनिया ने
ढेर सारे आँसू बहा कर
एक दिन में तुम्हें भुला दिया
शुक्र है कि
मेरी डिबिया में तुमने आँसू नहीं दिए
शुक्र है कि
मेरे आंसुओं में
तुम्हारी यादें नहीं घुलेंगी

Monday, December 26, 2011

tum kaun...kahan

ये जो हर बार तुम मेरी आग में
अपने हाथ सेकते-सेकते
हाथ पीछे खींच लेते हो
ये जो हर बार मेरा उन्माद
तुम्हारे माथे की शिकन बन जाता है
ये जो हर बार मेरी प्रीत
तुम्हारे नियमों की चारदीवारी लांघ कर
किसी अनजान देस में बरसने लगती है
मेरे मन में ये जाने कैसी
धुकधुकी लग जाती है
कि तुम 'तुम' नहीं
तुम अपने अनगिनत रूपों में भी
मानो अधूरे  हो
कि मेरी आग को जाने कब तक
मेरे अन्दर ही जलना होगा
कि तुम्हारे 'तुम' के दरस की ये आस
जाने कितने युगों तक
मुझे सोने नहीं देगी

Tuesday, December 20, 2011

तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
तुम बस व्यथित हो
अपनी किसी अकथ्य पीड़ा में घुल रहे हो
या अनैतिक सभाओं में
मेरी लाज बचाते बचाते थक गए हो
मेरे निर्वीर्य पतियों के प्रति
मेरा समर्पण देख कर ऊब चुके हो
पर तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
तुम्हें 'तुम' बोलने का अधिकार
आज भी सिर्फ मेरा है
तुम्हारी बांसुरी किसी के लिए भी हो
उसकी तान समझने का
सामर्थ्य मात्र मुझमें है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
मेरा छोटा सा संसार तुम्हारा ही रचा है
और तुम्हारी विशाल सृष्टि
मुझसे ही सुरभित है
तुम्हारा युद्ध हो या मेरा अज्ञातवास
अक्षयपात्र तुम्हें ही भरना है
और लहू मुझे ही पीना है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते

तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
क्योंकि तुम्हारी घृणा का भार
वहन करने की क्षमता नहीं है मुझमें
क्योंकि मेरे सखा तुमसे परे 
मेरा अस्तित्व असार है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
क्योंकि तुमने मुझे प्रीत भी सिखाई है
और प्रतिशोध भी
मेरी जय भी तुम हो
और पराजय भी
मेरी गरिमा भी तुम हो
और कलंक भी
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते 

Tuesday, November 22, 2011

किसी सुदूर स्वप्न की
आँखें चुरा कर
मैंने तुम्हे देखा
तुम्हे समझा
तुम्हारे अस्तित्व में स्वयं को
विलीन कर दिया
किसी दूरस्थ पीड़ा की नाव बना 
अपनी कहानियों में
उतारती रही
डुबोती रही

जाने किस पल में
मेरी आँखें मानो
मुझसे ही पराई हो गयीं
मेरी कहानियों ने मुझसे
बातें करनी बंद कर दी

Sunday, November 13, 2011

न जाने किस घड़ी में
शब्दों की आत्मा मर गयी 
न जाने किस क्षण में 
सार असार हो गया 
शब्दों ने अर्थ की परिभाषा बदल दी
अव्यक्त को नग्न किया 
वेदना को तिरस्कृत किया
****
मृत्ति और नभ,
ज्ञान और अज्ञान
के मध्य फँसा अस्तित्व
वीभत्स से भीत
करुणा से विगलित
अनंत की कामना में
अज्ञात की ओर बढ़ता
शब्दों का अस्तित्व




Thursday, October 13, 2011

न जाने इतिहास के कौन से छोर पर 
जीवन की धारा विभक्त हुई
और एक तरफ सभ्यता चली गयी 
दूसरी तरफ मात्र शब्द रह गए 

शब्दों ने अपने लिए 
शब्दों की एक नयी सभ्यता निर्मित कर ली
शब्दों की संवेदना, शब्दों के सम्बन्ध 
शब्दों का समाज और शब्दों का अस्तित्व 

शब्दों ने उस सुदूर सभ्यता का मूल्यांकन भी किया
अपने निबंधनों पर
अपनी सीमित परिधि में 
अपने कल्पित तर्कों से 

कभी अज्ञान के मरघट में 
उपहास का अलाव जलाया
तो कभी घृणा की मिटटी में 
शोषण के बीज बोये

यहाँ शब्दों के प्रपंच से दूर सभ्यता
प्रकृति के अंचल में फल फूल रही थी
जीवन के रस का वितरण कर रही थी 
वहाँ शब्दों का विस्तार गहराता रहा

लिप्साजन्य वस्त्राभूषणों से मंडित
तर्क रुपी शस्त्रास्त्रों से सज्जित
शब्दों का साम्राज्य 
सभ्यता के द्वार पर आकर खड़ा हो गया

प्रकृति का अंचल मानो 
लोलुपता के दैत्य के समक्ष छोटा पड़ गया
सभ्यता ने युगों से जिस संसृति को पोषित किया 
शब्दों ने उसकी नींव को विषाक्त कर दिया 

प्रश्न आधिपत्य का नहीं
प्रश्न अस्तित्व का है
सृष्टि के अस्तित्व का 
सभ्यता के और शब्दों के अस्तित्व का






Thursday, September 29, 2011

एक ख़ामोशी अपने उजले भेस में
जाने कहाँ से मेरी चौखट पर आकर खड़ी हो गयी
इससे पहले कि सुबह की परायी धूप 
मेरी खिड़की पर बरसे
मेरी ऊँगली थाम कर साथ साथ चलने लगी 

Sunday, September 4, 2011

महीनों बाद घर की दहलीज़ पर कदम रखा
तो बैठक में लगे एक खाली बिस्तर के सिरहाने में
२०११ के कैलेंडर पर चमचमाते कृष्ण दिखे

पिछले सालों के कृष्ण
शायद पुराने अखबारों के साथ
धूल की न जाने कितनी तहों के बीच
कहीं सम्हाल कर रखे हुए हैं
जिन्होंने साल दर साल
चेहरों पर नयी लकीरें बनती देखीं
और जिनसे हर बार घर से विदा लेते समय
मैंने उन लकीरों की हिफाज़त की दुआ माँगी

इस मुस्कराते कृष्ण और उन पुराने कृष्ण के बीच का फासला 
धूल की परतों और कैलेंडर के महीनों से पूरा नहीं पड़ता 
फासला उन लकीरों का है 
जो वक्त के पन्नों में गुम हो गयीं
उस बिस्तर का है
जिस पर सलवटें नहीं पडतीं 

इस नए कृष्ण से प्रीत नहीं हो पाती
मन नहीं मिल पाता
मानो दुआओं ने अपना मज़हब बदल लिया हो

Tuesday, March 22, 2011

इन बुझती-बुझती आँखों से 
इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

आओ हम बातें छेड़ें
कुछ सपनों की, उम्मीदों की 
आओ इस वक्त के पहलू में 
हम करें गुफ्तगू थोड़ी सी 

आओ इस पल के चूल्हे पर
कुछ आंच रखें बीते कल की
और जमी ठिठुरती रातों में 
हम यहीं जमाएं बैठक अपनी

इन भीगी पलकों को आखिर 
कुछ लम्हों का आराम मिला है 

इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

Thursday, February 3, 2011

न जाने क्या क्या कहाँ कहाँ
टूट गया है...
कभी हिम्मत करके टटोलो तो
उँगलियाँ छिल जाती हैं
*****