जाने किस छोर की तलाश में
मन यहाँ वहाँ भटकता रहा...
तेरे दरस की आस लिए
अनजाने रास्तों पे चलता रहा...
***
मेरी आँखों का आंसू
अब छलकना नहीं चाहता...
मेरे अंतस की पीड़ा को अब
मेरे मन से प्रीत हो गयी है...
***
कुछ बैठा बैठा सा लगता है अन्दर
कुछ जाना पहचाना
लेकिन फिर भी पराया...
Friday, December 18, 2009
Monday, November 23, 2009
Wednesday, October 14, 2009
दर्द अनंत है
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"
Thursday, September 17, 2009
Monday, April 6, 2009
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