Friday, December 18, 2009

जाने किस छोर की तलाश में
मन यहाँ वहाँ भटकता रहा...
तेरे दरस की आस लिए
अनजाने रास्तों पे चलता रहा...
***
मेरी आँखों का आंसू
अब छलकना नहीं चाहता...
मेरे अंतस की पीड़ा को अब
मेरे मन से प्रीत हो गयी है...
***
कुछ बैठा बैठा सा लगता है अन्दर
कुछ जाना पहचाना
लेकिन फिर भी पराया...

Monday, November 23, 2009

तेरी मुरली की तान
मेरे जीवन का सत, आधार बनी
तेरी गीता मन प्रांगण में
आकर मधुकर साकार बनी....
अब तुम ही बताओ हे गिरिधर
किस प्रतिमा का मैं ध्यान करूँ
किस के वंदन में गीत लिखूं
किस के आमद श्रृंगार करूँ ....
जो प्रीत लगायी है तुमसे
सदियों की कथा सुनाती है
बन के बिरहन की पीर कभी
इन अंसुअन में खो जाती है....
कतरे कतरे में आज मेरी
जो प्रीत तुम्हारी गाती है...
बन कर धड़कन की गूँज
मेरे मन का आँगन छू जाती है....

Wednesday, October 14, 2009

दर्द अनंत है
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।

ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था

उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।

पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।

धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****

मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।

पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"

Thursday, September 17, 2009

यूँ प्रीत बरसता साईं तुम्हारी आँखों से
हम जाने कितनी सदियाँ उनमें डुबो चले
एक कथा लिखी फिर से अनजाने हाथों ने
हम अंतस की पांखुरिआं उनमें पिरो चले...

Monday, April 6, 2009

इस वृत्त के पार क्या कोई विकल प्रकाश है
जो प्रीत की टहनी से छन कर
है बरसना चाहता

कहता है चुपके से मेरे मन - प्राण में
आकर समाकर
भूल से ही सही
अब तो तोड़ दो इस वृत्त को
और मूँद कर आँखें
खड़ी हो जाओ विभु की नीलिमा में

Sunday, January 11, 2009

काश खुदा टुकडों में बाँट दे हमें
और हर टुकड़े को अपनी मर्ज़ी जीने की इजाज़त दे दे