तेरी मुरली की तान
मेरे जीवन का सत, आधार बनी
तेरी गीता मन प्रांगण में
आकर मधुकर साकार बनी....
अब तुम ही बताओ हे गिरिधर
किस प्रतिमा का मैं ध्यान करूँ
किस के वंदन में गीत लिखूं
किस के आमद श्रृंगार करूँ ....
जो प्रीत लगायी है तुमसे
सदियों की कथा सुनाती है
बन के बिरहन की पीर कभी
इन अंसुअन में खो जाती है....
Monday, November 23, 2009
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