दर्द अनंत है
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"

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