हमने बेरुखी में आपकी
एक कश्मकश तो ज़रूर देखी है...
ये मुमकिन नहीं
कि वक़्त सिर्फ हमारी आँखों में रुका रहा
****
कोई काफ़िरों में नाम लिख दो हमारा
अब ये बंदगी हमसे निभाई नहीं जाती...
ये तुरबत तुम्हारी नहीं होगी किसी भी दम
कि कटे हाथों से तस्वीर बनायीं नहीं जाती...
Thursday, July 17, 2008
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