बूँद बूँद बन पीर ये छलके
आज मूँद जो बैठी पलकें
तपती धरती, तपती बूँदें
लह-लह जलता मन का आँगन
पिघली-पिघली इन बूंदों की
सेंक लगाता पिघला सा तन
किस मिट्टी की गोद में बरसे
या सीपी के होंठ को छू ले
बूँद बूँद बन पीर ये छलके
आज मूँद जो बैठी पलकें
या सीपी के होंठ को छू ले
बूँद बूँद बन पीर ये छलके
आज मूँद जो बैठी पलकें
