Wednesday, May 30, 2012


बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें

तपती धरती, तपती बूँदें
लह-लह जलता मन का आँगन
 
पिघली-पिघली इन बूंदों की
सेंक लगाता पिघला सा तन
 
किस मिट्टी की गोद में बरसे
या सीपी के होंठ को छू ले

बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें


 

Sunday, May 20, 2012

मैं क्यों साहित्य सुधा के
जीवन-रस का पान न कर पायी 
दर्शन  का  मर्म , विरह की पीड़ा 
क्यों श्रृंगार न लिख पायी
क्यों विभु के निर्मल आनन पर
एक रक्तिम रेख सदृश उभरे
क्यों त्याग वाक् की कोमलता
कविता की नस नस में बिफरे
क्यों अश्रु निरत नयनों की लाली
बन थर्राते रहे सदा
सदियों की कोई  द्रोह कथा
बस रहे सुनाते शब्द मेरे





मन  कैसे करे पार बोलो 
अनहद दुविधा की वैतरणी 
शंका की बढ़ती धूम -रेख 
प्रश्नों से विकल भीत रजनी 
किस ओर उलझ बैठा विवेक
किस ठौर बँधी  पीड़ा तन  की 
मैं किस  गिरिधर का ध्यान  करूँ 
अब कहाँ मिले संज्ञा मन  की