Wednesday, April 11, 2012

तुम इसी झंझा में 
बन आलोक मिलना 
मैं तुम्हारे दीप को
निज  अंजुलि में
धर अकम्पित 
चल पडूँगी 

पंथ रोके जो खड़े
वट वृक्ष उनको 
नमन मेरा
पर समर्पित 
वह्नि तुमको
मैं तुम्हारे संग जलूँगी 

कौन सा यह युद्ध
किसका यज्ञ है यह 
ज्ञात किसको 
बस तुम्हारी वेदना
और अश्रु के दो कण 
दिखाते राह सबको

उस अकल्पित के परे
द्रष्टव्य जो है
तुम उसी की ओर बढ़ना
मैं नए संग्राम के
निर्देश ले कर  
हे पथी तुमको मिलूँगी


Wednesday, April 4, 2012

तुम एक स्वप्न हो
जिसे मैंने पिछले दस सालों से
प्रति पल जिया है...
जिया है क्योंकि
स्वप्न बिखर जाते हैं
आँख खुलने के बाद...

कुछ तो था तुम में
कि तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे आस पास की दुनिया
समय के उस चौखटे में
बर्फ की तरह जम सी गयी
हम सब ने एक एक कर
अपने हिस्से के टुकड़ों को बटोरा
और अपने अन्दर की रुखी
सर्द ज़मीन पर सजा कर रख दिया
पिछले दस सालों से 
हर साल 
आज के दिन 
थोड़ी ठण्ड ज्यादा लगती है
उस रूखे, नीले पड़ गए हिस्से में
एक सूई चुभती है
और जीवन की कोशिकाएँ ढूँढती है

अब बातें नहीं याद आतीं
बस एक हँसी है
जो आँखों के सामने
चिपक सी गयी है...
एक स्पर्श है
जिसे मैं हर स्पर्श ढूँढती हूँ
और तुम्हारी नज़र है
जो आते-जाते अनगिनत चेहरों
से झाँकती है
मुस्करा कर ओझल हो जाती है...

तुम स्वप्न ही तो हो
सिर्फ नींद में दिखते हो
एक मूक सी भाषा में
कुछ कहते हो
हँसते हो
घूरते हो
और चुप हो जाते हो...