तुम इसी झंझा में
बन आलोक मिलना
मैं तुम्हारे दीप को
निज अंजुलि में
धर अकम्पित
चल पडूँगी
पंथ रोके जो खड़े
वट वृक्ष उनको
नमन मेरा
पर समर्पित
वह्नि तुमको
मैं तुम्हारे संग जलूँगी
कौन सा यह युद्ध
किसका यज्ञ है यह
ज्ञात किसको
बस तुम्हारी वेदना
और अश्रु के दो कण
दिखाते राह सबको
उस अकल्पित के परे
द्रष्टव्य जो है
तुम उसी की ओर बढ़ना
मैं नए संग्राम के
निर्देश ले कर
हे पथी तुमको मिलूँगी
