Thursday, January 26, 2012

मुर्दा अल्फाज़ों में उलझी बात
धीरे धीरे सरक कर
तुम्हारे करीब आती है
तुम्हारे ज़हन पर हावी हो जाती है
उस भीगी रात की पेशानी पर
कुछ लकीरें बना जाती है
****
मुझे चिढ़ हो गयी है
उन अल्फाज़ों से
नज्मों से
जिन्हें मुस्कराना नहीं आता
और रोने में उनकी तौहीन होती है
जिनकी मनहूसियत
तुम्हारी रातों में उल्लू की तरह बोलती है



Thursday, January 19, 2012

paraya

एक पराये देश में 
एक पराया अजनबी
एक परायी जुबान बोलते बोलते 
आपके कानो में 
आपकी भाषा का एक शब्द कहता है
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जाने कितनी देर तक
दो सृष्टियों में
दो अस्तित्व लेकर 
समय के दोनो पहियों को
काठ के एक तख्ते में 
जोड़ती रही
****
उस पराये देश का
वह पराया अजनबी
दूर, बहुत दूर 
अपने पराये कदम 
आपकी धरती पर रख रहा है
उसकी मिट्टी की खुशबु 
साँसों में भर रहा है