महीनों बाद घर की दहलीज़ पर कदम रखा
तो बैठक में लगे एक खाली बिस्तर के सिरहाने में
२०११ के कैलेंडर पर चमचमाते कृष्ण दिखे
पिछले सालों के कृष्ण
शायद पुराने अखबारों के साथ
धूल की न जाने कितनी तहों के बीच
कहीं सम्हाल कर रखे हुए हैं
जिन्होंने साल दर साल
चेहरों पर नयी लकीरें बनती देखीं
और जिनसे हर बार घर से विदा लेते समय
मैंने उन लकीरों की हिफाज़त की दुआ माँगी
इस मुस्कराते कृष्ण और उन पुराने कृष्ण के बीच का फासला
धूल की परतों और कैलेंडर के महीनों से पूरा नहीं पड़ता
फासला उन लकीरों का है
जो वक्त के पन्नों में गुम हो गयीं
उस बिस्तर का है
जिस पर सलवटें नहीं पडतीं
इस नए कृष्ण से प्रीत नहीं हो पाती
मन नहीं मिल पाता
मानो दुआओं ने अपना मज़हब बदल लिया हो

bahot badhiya....
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