Sunday, September 4, 2011

महीनों बाद घर की दहलीज़ पर कदम रखा
तो बैठक में लगे एक खाली बिस्तर के सिरहाने में
२०११ के कैलेंडर पर चमचमाते कृष्ण दिखे

पिछले सालों के कृष्ण
शायद पुराने अखबारों के साथ
धूल की न जाने कितनी तहों के बीच
कहीं सम्हाल कर रखे हुए हैं
जिन्होंने साल दर साल
चेहरों पर नयी लकीरें बनती देखीं
और जिनसे हर बार घर से विदा लेते समय
मैंने उन लकीरों की हिफाज़त की दुआ माँगी

इस मुस्कराते कृष्ण और उन पुराने कृष्ण के बीच का फासला 
धूल की परतों और कैलेंडर के महीनों से पूरा नहीं पड़ता 
फासला उन लकीरों का है 
जो वक्त के पन्नों में गुम हो गयीं
उस बिस्तर का है
जिस पर सलवटें नहीं पडतीं 

इस नए कृष्ण से प्रीत नहीं हो पाती
मन नहीं मिल पाता
मानो दुआओं ने अपना मज़हब बदल लिया हो

1 comment: