Tuesday, March 22, 2011

इन बुझती-बुझती आँखों से 
इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

आओ हम बातें छेड़ें
कुछ सपनों की, उम्मीदों की 
आओ इस वक्त के पहलू में 
हम करें गुफ्तगू थोड़ी सी 

आओ इस पल के चूल्हे पर
कुछ आंच रखें बीते कल की
और जमी ठिठुरती रातों में 
हम यहीं जमाएं बैठक अपनी

इन भीगी पलकों को आखिर 
कुछ लम्हों का आराम मिला है 

इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

1 comment: