मैंने अपनी मिट्टी से कुछ नहीं माँगा
सिवाए इसके कि
वो मेरी पहचान बने...
मेरे आंसुओं से सिंचती रहे
मेरी हंसी में खिलती रहे
मेरी आग में सिकती रहे
सिवाए इसके कि
वो मेरी पहचान बने...
मेरे आंसुओं से सिंचती रहे
मेरी हंसी में खिलती रहे
मेरी आग में सिकती रहे

badhia hai.
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