Monday, November 23, 2009

तेरी मुरली की तान
मेरे जीवन का सत, आधार बनी
तेरी गीता मन प्रांगण में
आकर मधुकर साकार बनी....
अब तुम ही बताओ हे गिरिधर
किस प्रतिमा का मैं ध्यान करूँ
किस के वंदन में गीत लिखूं
किस के आमद श्रृंगार करूँ ....
जो प्रीत लगायी है तुमसे
सदियों की कथा सुनाती है
बन के बिरहन की पीर कभी
इन अंसुअन में खो जाती है....
कतरे कतरे में आज मेरी
जो प्रीत तुम्हारी गाती है...
बन कर धड़कन की गूँज
मेरे मन का आँगन छू जाती है....