Wednesday, December 27, 2006



मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली...

मेरी आँखों के पानी में
अब उसकी परछाई नहीं पड़ती
मेरी चीख उसके कान से
टकरा कर लौट आती है

मेरे होठों से निकली कोई फ़रियाद
उसके दर तक नहीं पहुँचती
मेरी सदाएं मुझको ही
चिढ़ा कर चली जाती हैं


...मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली

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