उस दिन
एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता कि आवाज़ सुन
मैंने अपनी मिटटी बदल ली
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मेरे शब्दों से
उनके अर्थ छिन गए
और वे अंधेरों में
उजालों में भटकते
आँखों के कोने भिगोते
डूबते उतराते रहे
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हर उम्मीद
हर आस टूट गयी
मेरी सियाही
मेरे सच से बड़ी हो गयी
और मेरा पैगम्बर
मुझसे दामन छुड़ा कर चला गया...
Thursday, August 24, 2006
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बहुत बढिया रचना है|
ReplyDeleteभावों की अभिव्यक्ति अत्यंत सुन्दर हुई है|
लेकिन आप अगर देवनागरी में लिखें तो आनन्द बढ जाएगा|