Sunday, August 27, 2006

ये वक़्त भी रुका सा
और आँखों के आगे
दूर तक
क्षितिज के भी पार
सब कुछ ठहरा सा...
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तुम्हारे स्वप्न ढूंढते हैं
मेरे प्रश्नों के उत्तर
और मेरे प्रश्न युगों युगों तक
नाचते हैं तुम्हारे
अंतस के वृत्त पर...
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कोई इस ज़मीन पर
क्रांति की बात करता है
'कोशिशों' की,
बदलाव की.
कोई इन आँखों में
फिर नए स्वप्न देखना चाहता है...

Thursday, August 24, 2006

उस दिन
एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता कि आवाज़ सुन
मैंने अपनी मिटटी बदल ली
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मेरे शब्दों से
उनके अर्थ छिन गए
और वे अंधेरों में
उजालों में भटकते
आँखों के कोने भिगोते
डूबते उतराते रहे
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हर उम्मीद
हर आस टूट गयी
मेरी सियाही
मेरे सच से बड़ी हो गयी
और मेरा पैगम्बर
मुझसे दामन छुड़ा कर चला गया...