Wednesday, January 30, 2013

भूलते हैं शब्द
शब्दों में कहीं तुम कैद हो
क्या बताएँ
बस तुम्हारी साँस को सुनते रहे

तुम्हारी अधलिखी, अधसुनी
बेजान सी कहानियों से
ज़िन्दगी में रोज़
जिंदा मायने भरते रहे






Friday, January 25, 2013

कुछ बोलो ऐसा कि 
जी उठूँ 
कुछ तो बोलो ऐसा 
कि  लगे 
मैं एक चलती-फिरती लाश नहीं हूँ

कुछ बोलो ऐसा 
कि  मेरे आस पास का शोर 
ख़त्म हो जाए 
मैं तुम्हें 
और तुम मुझे सुन पाओ 

ज़बान से, हाथों से, आँखों से 
कुछ तो बोलो ऐसा

Thursday, January 24, 2013

कहीं कुछ तो सुगबुगाहट सी है
कुछ है जो
धीरे धीरे हिलता डुलता है
कुछ कहने की कोशिश करता है

कहीं पीछे मुड़ कर देखता है
लहराते हुए हाथ
लहुलुहान पैर
बरसों से जागी हुई आँखें

कुछ शब्द जो पराये हो गए हैं
उन्हें सुनने, समझने, बोलने की
कोशिश करता है

कुछ तो है
जो जिंदा है
जिंदा रहना चाहता है

Saturday, January 12, 2013

मेरी कविता और मेरे शब्द मर रहे  हैं
पता नहीं क्यूँ
कुछ तो है अन्दर जो धीरे धीरे मर रहा है

जो उछलता कूदता था
परेशानियां खड़ी  करता था
रोता था
और चिल्लाता भी था
आज आखिरी सांस गिन रहा है


अब सवाल ख़त्म हो गए हैं
और हिम्मत भी नहीं बची
नए सवाल ढूँढने की


एक अवाक सा शून्य है सामने
जिसे अपलक निहारता
तिल-तिल कर
दम तोड़ रहा है




Thursday, November 22, 2012

'Paash' ke liye....

वक़्त-बेवक़्त तुम्हारी आत्मा में सर उठाता विद्रोह
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कानों के परदे फाड़ डालने वाला, अल्फाजों से उठता शोर 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
दिल को हलक तक खींच लाती तुम्हारे उम्मीद की चीख 
सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

सबसे ख़तरनाक होता है 
सपनों के अस्थिपंजर को घूरना,
और पलकें झपकना भूल जाना 
सबसे ख़तरनाक होता है 
अपने और अपनों के लिए 
redundant हो जाना
फिर एक दिशा-हीन आंधी में
खुद को बहने देना
और अवचेतना का भ्रम पाल लेना 

सबसे खतरनाक वह शाबाशी होती है 
जो तुम्हारी हार के बाद भी 
तुम्हारी पीठ पर पड़ती है 
और घंटों तुम्हारे होठों पर 
हंसी बनकर बिखरी रहती है 

सबसे ख़तरनाक वह सन्नाटा होता है 
जो सूइयों की तरह चुभता है
और मन के vacuum में 
तुम्हारी सांसें टटोलता है

सबसे खतरनाक वह आइना होता है
जो हर सुबह तुमसे कहता है
कि तुम तैयार हो
जाओ एक मशीन के सामने बैठो
और किसी के दर्द की profiling करो
सबसे खतरनाक वह सुबह होती है
जो एक गहरी नींद लाती है
और तुम्हारे कानों में चुपके से गुनगुनाती है
'सो जा मुर्दे,
ये लड़ाई तो सपने में लड़ी जायेगी'


वक़्त-बेवक़्त तुम्हारी आत्मा में सर उठाता विद्रोह
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कानों के परदे फाड़ डालने वाला, अल्फाजों से उठता शोर 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
दिल को हलक तक खींच लाती तुम्हारे उम्मीद की चीख 
सबसे ख़तरनाक नहीं होती 



Wednesday, May 30, 2012


बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें

तपती धरती, तपती बूँदें
लह-लह जलता मन का आँगन
 
पिघली-पिघली इन बूंदों की
सेंक लगाता पिघला सा तन
 
किस मिट्टी की गोद में बरसे
या सीपी के होंठ को छू ले

बूँद बूँद बन  पीर ये छलके
आज  मूँद जो बैठी पलकें


 

Sunday, May 20, 2012

मैं क्यों साहित्य सुधा के
जीवन-रस का पान न कर पायी 
दर्शन  का  मर्म , विरह की पीड़ा 
क्यों श्रृंगार न लिख पायी
क्यों विभु के निर्मल आनन पर
एक रक्तिम रेख सदृश उभरे
क्यों त्याग वाक् की कोमलता
कविता की नस नस में बिफरे
क्यों अश्रु निरत नयनों की लाली
बन थर्राते रहे सदा
सदियों की कोई  द्रोह कथा
बस रहे सुनाते शब्द मेरे





मन  कैसे करे पार बोलो 
अनहद दुविधा की वैतरणी 
शंका की बढ़ती धूम -रेख 
प्रश्नों से विकल भीत रजनी 
किस ओर उलझ बैठा विवेक
किस ठौर बँधी  पीड़ा तन  की 
मैं किस  गिरिधर का ध्यान  करूँ 
अब कहाँ मिले संज्ञा मन  की






Wednesday, April 11, 2012

तुम इसी झंझा में 
बन आलोक मिलना 
मैं तुम्हारे दीप को
निज  अंजुलि में
धर अकम्पित 
चल पडूँगी 

पंथ रोके जो खड़े
वट वृक्ष उनको 
नमन मेरा
पर समर्पित 
वह्नि तुमको
मैं तुम्हारे संग जलूँगी 

कौन सा यह युद्ध
किसका यज्ञ है यह 
ज्ञात किसको 
बस तुम्हारी वेदना
और अश्रु के दो कण 
दिखाते राह सबको

उस अकल्पित के परे
द्रष्टव्य जो है
तुम उसी की ओर बढ़ना
मैं नए संग्राम के
निर्देश ले कर  
हे पथी तुमको मिलूँगी


Wednesday, April 4, 2012

तुम एक स्वप्न हो
जिसे मैंने पिछले दस सालों से
प्रति पल जिया है...
जिया है क्योंकि
स्वप्न बिखर जाते हैं
आँख खुलने के बाद...

कुछ तो था तुम में
कि तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे आस पास की दुनिया
समय के उस चौखटे में
बर्फ की तरह जम सी गयी
हम सब ने एक एक कर
अपने हिस्से के टुकड़ों को बटोरा
और अपने अन्दर की रुखी
सर्द ज़मीन पर सजा कर रख दिया
पिछले दस सालों से 
हर साल 
आज के दिन 
थोड़ी ठण्ड ज्यादा लगती है
उस रूखे, नीले पड़ गए हिस्से में
एक सूई चुभती है
और जीवन की कोशिकाएँ ढूँढती है

अब बातें नहीं याद आतीं
बस एक हँसी है
जो आँखों के सामने
चिपक सी गयी है...
एक स्पर्श है
जिसे मैं हर स्पर्श ढूँढती हूँ
और तुम्हारी नज़र है
जो आते-जाते अनगिनत चेहरों
से झाँकती है
मुस्करा कर ओझल हो जाती है...

तुम स्वप्न ही तो हो
सिर्फ नींद में दिखते हो
एक मूक सी भाषा में
कुछ कहते हो
हँसते हो
घूरते हो
और चुप हो जाते हो...




Wednesday, March 21, 2012

Meri sabse priy adhyapika ke liye

कुछ यादों की मैंने मूर्ति बना कर
मन-मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया है
कि पूजा की धूप-बाती
अंतस को सुरभित करती रहे

कुछ यादों को मैंने शब्दों में सहेज कर रखा है
कि कहीं कल एक दूसरे को देख न पायें
तो उन शब्दों से गीत लिखेंगे
इस उम्मीद के साथ कि
हमारे गीत एक दूसरे के कानों तक पहुँच सकें

कुछ यादों के मैंने गोटे और सितारे बनाये हैं
अपने ब्याह की ओढ़नी में टाँकने के लिए
ताकि आपका आशीर्वाद उनसे छन कर
मेरी मांग पर बरसे


कुछ यादों की मैंने ऊँगली थाम कर रखी है
इस भीड़ के छँटने तक,
फिर बैठेंगे आराम से
और ढेर सारी बातें करेंगे


कुछ यादों को बस याद बना कर
अपनी आँखों में रोक लिया है
कि जब एक अच्छी नींद आये
तो एक बार फिर से आपसे
अपने सपनों में  मिल लूँ...


Thursday, January 26, 2012

मुर्दा अल्फाज़ों में उलझी बात
धीरे धीरे सरक कर
तुम्हारे करीब आती है
तुम्हारे ज़हन पर हावी हो जाती है
उस भीगी रात की पेशानी पर
कुछ लकीरें बना जाती है
****
मुझे चिढ़ हो गयी है
उन अल्फाज़ों से
नज्मों से
जिन्हें मुस्कराना नहीं आता
और रोने में उनकी तौहीन होती है
जिनकी मनहूसियत
तुम्हारी रातों में उल्लू की तरह बोलती है



Thursday, January 19, 2012

paraya

एक पराये देश में 
एक पराया अजनबी
एक परायी जुबान बोलते बोलते 
आपके कानो में 
आपकी भाषा का एक शब्द कहता है
****
जाने कितनी देर तक
दो सृष्टियों में
दो अस्तित्व लेकर 
समय के दोनो पहियों को
काठ के एक तख्ते में 
जोड़ती रही
****
उस पराये देश का
वह पराया अजनबी
दूर, बहुत दूर 
अपने पराये कदम 
आपकी धरती पर रख रहा है
उसकी मिट्टी की खुशबु 
साँसों में भर रहा है

Wednesday, December 28, 2011

Nana-nani ke liye

इस कविता को समझ में नहीं आ रहा
कि वह कहाँ से शुरू हो
स्कूल के पहले दिन से?
जब मैंने जिद की थी
मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना
या उन एकाकी पलों से
जब तुमने स्वयं को
एक अनन्त मौन में समेट लिया
और मैंने तुम्हारे साथ बिताये
हर लम्हे को
मन की डिबिया में सहेज कर
रखना शुरू किया
गाँधी और सरोजिनी नायडू से लेकर
सुन्दर काण्ड की अशोक वाटिका तक
लोकसभा चुनाव के परिणामों से लेकर
आलू-मेथी की सूखी सब्जी तक
तुम दोनों की खटपट से लेकर
प्रीत की अनन्य परिभाषा तक
सब कुछ तो बंद है
उस छोटी सी डिबिया में

मेरे आस पास की दुनिया ने
ढेर सारे आँसू बहा कर
एक दिन में तुम्हें भुला दिया
शुक्र है कि
मेरी डिबिया में तुमने आँसू नहीं दिए
शुक्र है कि
मेरे आंसुओं में
तुम्हारी यादें नहीं घुलेंगी

Monday, December 26, 2011

tum kaun...kahan

ये जो हर बार तुम मेरी आग में
अपने हाथ सेकते-सेकते
हाथ पीछे खींच लेते हो
ये जो हर बार मेरा उन्माद
तुम्हारे माथे की शिकन बन जाता है
ये जो हर बार मेरी प्रीत
तुम्हारे नियमों की चारदीवारी लांघ कर
किसी अनजान देस में बरसने लगती है
मेरे मन में ये जाने कैसी
धुकधुकी लग जाती है
कि तुम 'तुम' नहीं
तुम अपने अनगिनत रूपों में भी
मानो अधूरे  हो
कि मेरी आग को जाने कब तक
मेरे अन्दर ही जलना होगा
कि तुम्हारे 'तुम' के दरस की ये आस
जाने कितने युगों तक
मुझे सोने नहीं देगी

Tuesday, December 20, 2011

तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
तुम बस व्यथित हो
अपनी किसी अकथ्य पीड़ा में घुल रहे हो
या अनैतिक सभाओं में
मेरी लाज बचाते बचाते थक गए हो
मेरे निर्वीर्य पतियों के प्रति
मेरा समर्पण देख कर ऊब चुके हो
पर तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
तुम्हें 'तुम' बोलने का अधिकार
आज भी सिर्फ मेरा है
तुम्हारी बांसुरी किसी के लिए भी हो
उसकी तान समझने का
सामर्थ्य मात्र मुझमें है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
मेरा छोटा सा संसार तुम्हारा ही रचा है
और तुम्हारी विशाल सृष्टि
मुझसे ही सुरभित है
तुम्हारा युद्ध हो या मेरा अज्ञातवास
अक्षयपात्र तुम्हें ही भरना है
और लहू मुझे ही पीना है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते

तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
क्योंकि तुम्हारी घृणा का भार
वहन करने की क्षमता नहीं है मुझमें
क्योंकि मेरे सखा तुमसे परे 
मेरा अस्तित्व असार है
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते
क्योंकि तुमने मुझे प्रीत भी सिखाई है
और प्रतिशोध भी
मेरी जय भी तुम हो
और पराजय भी
मेरी गरिमा भी तुम हो
और कलंक भी
तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकते 

Tuesday, November 22, 2011

किसी सुदूर स्वप्न की
आँखें चुरा कर
मैंने तुम्हे देखा
तुम्हे समझा
तुम्हारे अस्तित्व में स्वयं को
विलीन कर दिया
किसी दूरस्थ पीड़ा की नाव बना 
अपनी कहानियों में
उतारती रही
डुबोती रही

जाने किस पल में
मेरी आँखें मानो
मुझसे ही पराई हो गयीं
मेरी कहानियों ने मुझसे
बातें करनी बंद कर दी

Sunday, November 13, 2011

न जाने किस घड़ी में
शब्दों की आत्मा मर गयी 
न जाने किस क्षण में 
सार असार हो गया 
शब्दों ने अर्थ की परिभाषा बदल दी
अव्यक्त को नग्न किया 
वेदना को तिरस्कृत किया
****
मृत्ति और नभ,
ज्ञान और अज्ञान
के मध्य फँसा अस्तित्व
वीभत्स से भीत
करुणा से विगलित
अनंत की कामना में
अज्ञात की ओर बढ़ता
शब्दों का अस्तित्व




Thursday, October 13, 2011

न जाने इतिहास के कौन से छोर पर 
जीवन की धारा विभक्त हुई
और एक तरफ सभ्यता चली गयी 
दूसरी तरफ मात्र शब्द रह गए 

शब्दों ने अपने लिए 
शब्दों की एक नयी सभ्यता निर्मित कर ली
शब्दों की संवेदना, शब्दों के सम्बन्ध 
शब्दों का समाज और शब्दों का अस्तित्व 

शब्दों ने उस सुदूर सभ्यता का मूल्यांकन भी किया
अपने निबंधनों पर
अपनी सीमित परिधि में 
अपने कल्पित तर्कों से 

कभी अज्ञान के मरघट में 
उपहास का अलाव जलाया
तो कभी घृणा की मिटटी में 
शोषण के बीज बोये

यहाँ शब्दों के प्रपंच से दूर सभ्यता
प्रकृति के अंचल में फल फूल रही थी
जीवन के रस का वितरण कर रही थी 
वहाँ शब्दों का विस्तार गहराता रहा

लिप्साजन्य वस्त्राभूषणों से मंडित
तर्क रुपी शस्त्रास्त्रों से सज्जित
शब्दों का साम्राज्य 
सभ्यता के द्वार पर आकर खड़ा हो गया

प्रकृति का अंचल मानो 
लोलुपता के दैत्य के समक्ष छोटा पड़ गया
सभ्यता ने युगों से जिस संसृति को पोषित किया 
शब्दों ने उसकी नींव को विषाक्त कर दिया 

प्रश्न आधिपत्य का नहीं
प्रश्न अस्तित्व का है
सृष्टि के अस्तित्व का 
सभ्यता के और शब्दों के अस्तित्व का






Thursday, September 29, 2011

एक ख़ामोशी अपने उजले भेस में
जाने कहाँ से मेरी चौखट पर आकर खड़ी हो गयी
इससे पहले कि सुबह की परायी धूप 
मेरी खिड़की पर बरसे
मेरी ऊँगली थाम कर साथ साथ चलने लगी 

Sunday, September 4, 2011

महीनों बाद घर की दहलीज़ पर कदम रखा
तो बैठक में लगे एक खाली बिस्तर के सिरहाने में
२०११ के कैलेंडर पर चमचमाते कृष्ण दिखे

पिछले सालों के कृष्ण
शायद पुराने अखबारों के साथ
धूल की न जाने कितनी तहों के बीच
कहीं सम्हाल कर रखे हुए हैं
जिन्होंने साल दर साल
चेहरों पर नयी लकीरें बनती देखीं
और जिनसे हर बार घर से विदा लेते समय
मैंने उन लकीरों की हिफाज़त की दुआ माँगी

इस मुस्कराते कृष्ण और उन पुराने कृष्ण के बीच का फासला 
धूल की परतों और कैलेंडर के महीनों से पूरा नहीं पड़ता 
फासला उन लकीरों का है 
जो वक्त के पन्नों में गुम हो गयीं
उस बिस्तर का है
जिस पर सलवटें नहीं पडतीं 

इस नए कृष्ण से प्रीत नहीं हो पाती
मन नहीं मिल पाता
मानो दुआओं ने अपना मज़हब बदल लिया हो

Tuesday, March 22, 2011

इन बुझती-बुझती आँखों से 
इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

आओ हम बातें छेड़ें
कुछ सपनों की, उम्मीदों की 
आओ इस वक्त के पहलू में 
हम करें गुफ्तगू थोड़ी सी 

आओ इस पल के चूल्हे पर
कुछ आंच रखें बीते कल की
और जमी ठिठुरती रातों में 
हम यहीं जमाएं बैठक अपनी

इन भीगी पलकों को आखिर 
कुछ लम्हों का आराम मिला है 

इक पिघला-पिघला दिन निकला है ...

Thursday, February 3, 2011

न जाने क्या क्या कहाँ कहाँ
टूट गया है...
कभी हिम्मत करके टटोलो तो
उँगलियाँ छिल जाती हैं
*****



Tuesday, November 30, 2010

मार्च 2006

Sunday, August 22, 2010

हर मोड़ पे सर्द चेहरे
और सर्द चेहरों की सर्द कहानियाँ...
मुझे फिर कोई ओजस्वी कहानी सुनाओ
की वक़्त थम जाए
और अपनी दिशा बदलने की ज़िद कर बैठे....
मैंने अपनी मिट्टी से कुछ नहीं माँगा
सिवाए इसके कि
वो मेरी पहचान बने...
मेरे आंसुओं से सिंचती रहे
मेरी हंसी में खिलती रहे
मेरी आग में सिकती रहे

Sunday, April 18, 2010

इस गीली धरती के ऊपर
एक हवा गुज़रती जाती है
जाने किस देस से आई है
जाने क्यूँ हमको भाती है
****

Sunday, March 21, 2010

सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
सच,
तुम्हारी कल्पना का धनुर्धर योद्धा।
सच,
अवध्य, अजेय।
तुम्हारी पलकों पर बिखरी,
मधुर स्मृति सा निर्मल,
प्रांजल, निष्कलंक सच।
सच,
जिसकी ज्योति को
तुमने धूमिल होते नहीं देखा,
जिसकी तेज धार पर चलकर
तुमने सैकड़ों अग्निपरीक्षायें दी,
जिसके कोदंड की शक्ति ने
तुम्हे नव-युग प्रणेता बना दिया।
****
सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
तुम नयी आँखें लगा कर
देखती हो दूर
जाने किस क्षितिज के पार ।
सूर्य ने खोली नहीं है आँख
अपनी लाल पलकें मूँद कर
वह मंद मुस्काता खड़ा है ।
और तारे ऊंघते से दीखते हैं
चाँद कि डोली सजाये
ले रहे तुमसे विदा हैं।
****

कुछ नया सा भर रहा है
आज साँसों में।
पिघलती ओस सा
सब कुछ पिघलता दीखता है।
खोल दो गाँठें सभी
और दर्द को बन नीर
मन के पोर से बहने दो अब,
कि अब नहीं रोके रुकेगा
ये विकट उन्माद
और अब नहीं थामे थमेगा
मौन करुणा की दुशाला ओढ़ बैठा
फिर किसी प्लावित व्यथा का नाद।

Tuesday, January 19, 2010

मन के किसी उदास कोने में
जाने कौन सी धूप पड़ी...
जाने कितने अचीन्हे एहसासों को जगा गयी
मन को एक आदिम पीड़ा कि याद दिला गयी

Friday, January 8, 2010

आज हमने कुछ बोलते हुए बेज़ुबान देखे
अपनी हालत से ना वाकिफ़ परेशान देखे

Friday, December 18, 2009

जाने किस छोर की तलाश में
मन यहाँ वहाँ भटकता रहा...
तेरे दरस की आस लिए
अनजाने रास्तों पे चलता रहा...
***
मेरी आँखों का आंसू
अब छलकना नहीं चाहता...
मेरे अंतस की पीड़ा को अब
मेरे मन से प्रीत हो गयी है...
***
कुछ बैठा बैठा सा लगता है अन्दर
कुछ जाना पहचाना
लेकिन फिर भी पराया...

Monday, November 23, 2009

तेरी मुरली की तान
मेरे जीवन का सत, आधार बनी
तेरी गीता मन प्रांगण में
आकर मधुकर साकार बनी....
अब तुम ही बताओ हे गिरिधर
किस प्रतिमा का मैं ध्यान करूँ
किस के वंदन में गीत लिखूं
किस के आमद श्रृंगार करूँ ....
जो प्रीत लगायी है तुमसे
सदियों की कथा सुनाती है
बन के बिरहन की पीर कभी
इन अंसुअन में खो जाती है....
कतरे कतरे में आज मेरी
जो प्रीत तुम्हारी गाती है...
बन कर धड़कन की गूँज
मेरे मन का आँगन छू जाती है....

Wednesday, October 14, 2009

दर्द अनंत है
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।

ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था

उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।

पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।

धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****

मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।

पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"

Thursday, September 17, 2009

यूँ प्रीत बरसता साईं तुम्हारी आँखों से
हम जाने कितनी सदियाँ उनमें डुबो चले
एक कथा लिखी फिर से अनजाने हाथों ने
हम अंतस की पांखुरिआं उनमें पिरो चले...

Monday, April 6, 2009

इस वृत्त के पार क्या कोई विकल प्रकाश है
जो प्रीत की टहनी से छन कर
है बरसना चाहता

कहता है चुपके से मेरे मन - प्राण में
आकर समाकर
भूल से ही सही
अब तो तोड़ दो इस वृत्त को
और मूँद कर आँखें
खड़ी हो जाओ विभु की नीलिमा में

Sunday, January 11, 2009

काश खुदा टुकडों में बाँट दे हमें
और हर टुकड़े को अपनी मर्ज़ी जीने की इजाज़त दे दे

Saturday, December 6, 2008

कोई अजनबी दुनिया है शायद जहाँ
वक़्त रुकता है और आपसे ढेर सारी बातें करता है...
एहसासों को पल पल जीता है

कोई अजनबी दुनिया है शायद जहां
ज़माने का शोर आपके कानों से महज़ टकरा कर लौट जाता है
आपकी आत्मा में उतर कर आपके रेशे रेशे को नहीं चबा जाता

Tuesday, October 14, 2008


मृत्यु सी जिह्वा निकाले आज
पूछे काल मुझसे-
"क्यों नहीं जलती
विकट संग्राम बन कर
एक वह्नि जो तुम्हारी हर शिरा में
रक्त बनकर बह रही है।
क्यों नहीं फिर से उठाता शीश
तेरी आत्मा में श्वास लेता
क्रान्ति का वह तूर्य
जिसने प्रण लिया था मुक्ति का।"

Thursday, July 17, 2008

हमने बेरुखी में आपकी
एक कश्मकश तो ज़रूर देखी है...

ये मुमकिन नहीं
कि वक़्त सिर्फ हमारी आँखों में रुका रहा


****

कोई काफ़िरों में नाम लिख दो हमारा
अब ये बंदगी हमसे निभाई नहीं जाती...

ये तुरबत तुम्हारी नहीं होगी किसी भी दम
कि कटे हाथों से तस्वीर बनायीं नहीं जाती...

Wednesday, July 16, 2008

वो सच तुम्हारा

आज भी ऊँगली उठाता है

किसी विश्वास पर...

विश्वास जो लंगड़ाता चल रहा है

तुम्हारे साथ

तुम्हारी परछाई बन...

ये किसी अनागत का दरस नहीं...

ये किसी भविष्य कि पीड़ा नहीं..

Monday, July 14, 2008

किसे नहीं मालूम
कि कुछ घंटो का सफ़र बस बाकी है...

मेरे मोहसिन तुमसे कुछ कहने को जी करता है...
तुमसे कुछ सुनने को जी करता है...
उनकी आँखें जाने कितनी देर
एक शून्य को निहारती रहीं...

और हम इस उम्मीद में बैठे रहे
कि कोई सहर इस रास्ते भी गुज़रेगी...
एक खाली कैनवस सी ज़िन्दगी...
जिसमे झाँको तो
अपनी ही सूरत काली नज़र आती है...

****
आज फिर एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता की आवाज़ सुन
किसी ने अपनी मिट्टी बदल ली.. :)

****

Saturday, June 21, 2008

शब्द मिलते जो
दिशा भी ढूँढ लाती मैं कहीं से...
यूँ विहग सी
भीत, व्याकुल चुप न रहती लेखनी भी...
****
क्यूँ धरा की कुक्षि से
अब जन्म लेता तिमिर है
क्यूँ नहीं अब परशु ले कर
निकलता कोई सूर्य है....

Wednesday, December 27, 2006



मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली...

मेरी आँखों के पानी में
अब उसकी परछाई नहीं पड़ती
मेरी चीख उसके कान से
टकरा कर लौट आती है

मेरे होठों से निकली कोई फ़रियाद
उसके दर तक नहीं पहुँचती
मेरी सदाएं मुझको ही
चिढ़ा कर चली जाती हैं


...मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली

Sunday, August 27, 2006

ये वक़्त भी रुका सा
और आँखों के आगे
दूर तक
क्षितिज के भी पार
सब कुछ ठहरा सा...
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तुम्हारे स्वप्न ढूंढते हैं
मेरे प्रश्नों के उत्तर
और मेरे प्रश्न युगों युगों तक
नाचते हैं तुम्हारे
अंतस के वृत्त पर...
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कोई इस ज़मीन पर
क्रांति की बात करता है
'कोशिशों' की,
बदलाव की.
कोई इन आँखों में
फिर नए स्वप्न देखना चाहता है...

Thursday, August 24, 2006

उस दिन
एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता कि आवाज़ सुन
मैंने अपनी मिटटी बदल ली
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मेरे शब्दों से
उनके अर्थ छिन गए
और वे अंधेरों में
उजालों में भटकते
आँखों के कोने भिगोते
डूबते उतराते रहे
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हर उम्मीद
हर आस टूट गयी
मेरी सियाही
मेरे सच से बड़ी हो गयी
और मेरा पैगम्बर
मुझसे दामन छुड़ा कर चला गया...

Monday, December 26, 2005

मेरे ख़िज़र को मेरी याद दिला दो
वो जाने किस वीराने में खो गया