हर मोड़ पे सर्द चेहरे
और सर्द चेहरों की सर्द कहानियाँ...
मुझे फिर कोई ओजस्वी कहानी सुनाओ
की वक़्त थम जाए
और अपनी दिशा बदलने की ज़िद कर बैठे....
Sunday, August 22, 2010
Sunday, April 18, 2010
Sunday, March 21, 2010
सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
सच,
तुम्हारी कल्पना का धनुर्धर योद्धा।
सच,
अवध्य, अजेय।
तुम्हारी पलकों पर बिखरी,
मधुर स्मृति सा निर्मल,
प्रांजल, निष्कलंक सच।
सच,
जिसकी ज्योति को
तुमने धूमिल होते नहीं देखा,
जिसकी तेज धार पर चलकर
तुमने सैकड़ों अग्निपरीक्षायें दी,
जिसके कोदंड की शक्ति ने
तुम्हे नव-युग प्रणेता बना दिया।
****
सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
सच,
तुम्हारी कल्पना का धनुर्धर योद्धा।
सच,
अवध्य, अजेय।
तुम्हारी पलकों पर बिखरी,
मधुर स्मृति सा निर्मल,
प्रांजल, निष्कलंक सच।
सच,
जिसकी ज्योति को
तुमने धूमिल होते नहीं देखा,
जिसकी तेज धार पर चलकर
तुमने सैकड़ों अग्निपरीक्षायें दी,
जिसके कोदंड की शक्ति ने
तुम्हे नव-युग प्रणेता बना दिया।
****
सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
तुम नयी आँखें लगा कर
देखती हो दूर
जाने किस क्षितिज के पार ।
सूर्य ने खोली नहीं है आँख
अपनी लाल पलकें मूँद कर
वह मंद मुस्काता खड़ा है ।
और तारे ऊंघते से दीखते हैं
चाँद कि डोली सजाये
ले रहे तुमसे विदा हैं।
****
कुछ नया सा भर रहा है
आज साँसों में।
पिघलती ओस सा
सब कुछ पिघलता दीखता है।
खोल दो गाँठें सभी
और दर्द को बन नीर
मन के पोर से बहने दो अब,
कि अब नहीं रोके रुकेगा
ये विकट उन्माद
और अब नहीं थामे थमेगा
मौन करुणा की दुशाला ओढ़ बैठा
फिर किसी प्लावित व्यथा का नाद।
देखती हो दूर
जाने किस क्षितिज के पार ।
सूर्य ने खोली नहीं है आँख
अपनी लाल पलकें मूँद कर
वह मंद मुस्काता खड़ा है ।
और तारे ऊंघते से दीखते हैं
चाँद कि डोली सजाये
ले रहे तुमसे विदा हैं।
****
कुछ नया सा भर रहा है
आज साँसों में।
पिघलती ओस सा
सब कुछ पिघलता दीखता है।
खोल दो गाँठें सभी
और दर्द को बन नीर
मन के पोर से बहने दो अब,
कि अब नहीं रोके रुकेगा
ये विकट उन्माद
और अब नहीं थामे थमेगा
मौन करुणा की दुशाला ओढ़ बैठा
फिर किसी प्लावित व्यथा का नाद।
Tuesday, January 19, 2010
Friday, December 18, 2009
Monday, November 23, 2009
Wednesday, October 14, 2009
दर्द अनंत है
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"
मैंने मान लिया
दर्द अनादि है
आज तुम भी मान लो ।
ये अनादि-अनंत की बातें
कही थी किसी ने
जब उसने मुरली छोड़ कर
पाञ्चजन्य उठाया था
उसे तो इतिहास रचना था,
कर्मयोगी कहाना था।
पर तुम?
तुम तो उन्ही लता-कुंजों में भटकती रही
कुंजबिहारी की प्रतीक्षा में।
धर्मयुद्ध समाप्त हुआ
और पाञ्चजन्य-धारी विजयी...
पर तुम्हारा मुरलीधर नहीं लौटा
और प्रतीक्षा की आँखें पथरा गयीं।
****
मानो युगों पहले की बात लगती है,
तुम्हारा भ्रम टूटा था,
स्वप्न टूटा था।
नियति के भयावह चक्रवात ने
तुम्हें यथार्थ की कठोर ज़मीन पर ला पटका
तुम्हारे स्वत्व के चीथड़े कर दिए।
पराजित, निश्चेष्ट तुम्हारा स्वत्व
कराहता रहा
तुम कराहती रही -
"गिरिधर तुम्हारी बांसुरी की
तान ऐसी तो न थी।"
Thursday, September 17, 2009
Monday, April 6, 2009
Sunday, January 11, 2009
Saturday, December 6, 2008
Tuesday, October 14, 2008
Thursday, July 17, 2008
Wednesday, July 16, 2008
Monday, July 14, 2008
Saturday, June 21, 2008
Wednesday, December 27, 2006
Sunday, August 27, 2006
ये वक़्त भी रुका सा
और आँखों के आगे
दूर तक
क्षितिज के भी पार
सब कुछ ठहरा सा...
****
तुम्हारे स्वप्न ढूंढते हैं
मेरे प्रश्नों के उत्तर
और मेरे प्रश्न युगों युगों तक
नाचते हैं तुम्हारे
अंतस के वृत्त पर...
****
कोई इस ज़मीन पर
क्रांति की बात करता है
'कोशिशों' की,
बदलाव की.
कोई इन आँखों में
फिर नए स्वप्न देखना चाहता है...
और आँखों के आगे
दूर तक
क्षितिज के भी पार
सब कुछ ठहरा सा...
****
तुम्हारे स्वप्न ढूंढते हैं
मेरे प्रश्नों के उत्तर
और मेरे प्रश्न युगों युगों तक
नाचते हैं तुम्हारे
अंतस के वृत्त पर...
****
कोई इस ज़मीन पर
क्रांति की बात करता है
'कोशिशों' की,
बदलाव की.
कोई इन आँखों में
फिर नए स्वप्न देखना चाहता है...
Thursday, August 24, 2006
Subscribe to:
Posts (Atom)
