Monday, April 6, 2009

इस वृत्त के पार क्या कोई विकल प्रकाश है
जो प्रीत की टहनी से छन कर
है बरसना चाहता

कहता है चुपके से मेरे मन - प्राण में
आकर समाकर
भूल से ही सही
अब तो तोड़ दो इस वृत्त को
और मूँद कर आँखें
खड़ी हो जाओ विभु की नीलिमा में

Sunday, January 11, 2009

काश खुदा टुकडों में बाँट दे हमें
और हर टुकड़े को अपनी मर्ज़ी जीने की इजाज़त दे दे

Saturday, December 6, 2008

कोई अजनबी दुनिया है शायद जहाँ
वक़्त रुकता है और आपसे ढेर सारी बातें करता है...
एहसासों को पल पल जीता है

कोई अजनबी दुनिया है शायद जहां
ज़माने का शोर आपके कानों से महज़ टकरा कर लौट जाता है
आपकी आत्मा में उतर कर आपके रेशे रेशे को नहीं चबा जाता

Tuesday, October 14, 2008


मृत्यु सी जिह्वा निकाले आज
पूछे काल मुझसे-
"क्यों नहीं जलती
विकट संग्राम बन कर
एक वह्नि जो तुम्हारी हर शिरा में
रक्त बनकर बह रही है।
क्यों नहीं फिर से उठाता शीश
तेरी आत्मा में श्वास लेता
क्रान्ति का वह तूर्य
जिसने प्रण लिया था मुक्ति का।"

Thursday, July 17, 2008

हमने बेरुखी में आपकी
एक कश्मकश तो ज़रूर देखी है...

ये मुमकिन नहीं
कि वक़्त सिर्फ हमारी आँखों में रुका रहा


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कोई काफ़िरों में नाम लिख दो हमारा
अब ये बंदगी हमसे निभाई नहीं जाती...

ये तुरबत तुम्हारी नहीं होगी किसी भी दम
कि कटे हाथों से तस्वीर बनायीं नहीं जाती...

Wednesday, July 16, 2008

वो सच तुम्हारा

आज भी ऊँगली उठाता है

किसी विश्वास पर...

विश्वास जो लंगड़ाता चल रहा है

तुम्हारे साथ

तुम्हारी परछाई बन...

ये किसी अनागत का दरस नहीं...

ये किसी भविष्य कि पीड़ा नहीं..

Monday, July 14, 2008

किसे नहीं मालूम
कि कुछ घंटो का सफ़र बस बाकी है...

मेरे मोहसिन तुमसे कुछ कहने को जी करता है...
तुमसे कुछ सुनने को जी करता है...
उनकी आँखें जाने कितनी देर
एक शून्य को निहारती रहीं...

और हम इस उम्मीद में बैठे रहे
कि कोई सहर इस रास्ते भी गुज़रेगी...
एक खाली कैनवस सी ज़िन्दगी...
जिसमे झाँको तो
अपनी ही सूरत काली नज़र आती है...

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आज फिर एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता की आवाज़ सुन
किसी ने अपनी मिट्टी बदल ली.. :)

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Saturday, June 21, 2008

शब्द मिलते जो
दिशा भी ढूँढ लाती मैं कहीं से...
यूँ विहग सी
भीत, व्याकुल चुप न रहती लेखनी भी...
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क्यूँ धरा की कुक्षि से
अब जन्म लेता तिमिर है
क्यूँ नहीं अब परशु ले कर
निकलता कोई सूर्य है....

Wednesday, December 27, 2006



मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली...

मेरी आँखों के पानी में
अब उसकी परछाई नहीं पड़ती
मेरी चीख उसके कान से
टकरा कर लौट आती है

मेरे होठों से निकली कोई फ़रियाद
उसके दर तक नहीं पहुँचती
मेरी सदाएं मुझको ही
चिढ़ा कर चली जाती हैं


...मेरे खिज़र ने अपनी सूरत बदल ली

Sunday, August 27, 2006

ये वक़्त भी रुका सा
और आँखों के आगे
दूर तक
क्षितिज के भी पार
सब कुछ ठहरा सा...
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तुम्हारे स्वप्न ढूंढते हैं
मेरे प्रश्नों के उत्तर
और मेरे प्रश्न युगों युगों तक
नाचते हैं तुम्हारे
अंतस के वृत्त पर...
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कोई इस ज़मीन पर
क्रांति की बात करता है
'कोशिशों' की,
बदलाव की.
कोई इन आँखों में
फिर नए स्वप्न देखना चाहता है...

Thursday, August 24, 2006

उस दिन
एक अचीन्हे लोक के
अचीन्हे देवता कि आवाज़ सुन
मैंने अपनी मिटटी बदल ली
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मेरे शब्दों से
उनके अर्थ छिन गए
और वे अंधेरों में
उजालों में भटकते
आँखों के कोने भिगोते
डूबते उतराते रहे
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हर उम्मीद
हर आस टूट गयी
मेरी सियाही
मेरे सच से बड़ी हो गयी
और मेरा पैगम्बर
मुझसे दामन छुड़ा कर चला गया...

Monday, December 26, 2005

मेरे ख़िज़र को मेरी याद दिला दो
वो जाने किस वीराने में खो गया