मैं आँखें बंद कर, बाँहें फैलाए
गोधूलि के आसमान के नीचे खड़ी रही
मेरे अस्तित्व के रेशे-रेशे
अक्षर बन उस आसमान की लाली में खोते रहे
मेरे शरीर से, मेरी आत्मा से
पृथक होते रहे
ये अक्षरों के रेशे
साँसों से निकलते रहे,
आँखों से बहते रहे
शरीर के पोरों से
कभी थकान तो कभी आक्रोश बन
रिसते रहे
मैं नहीं जानती
अक्षरों के पीछे क्या है
जब ये सारे रेशे निकल जाएंगे
तो क्या रह जाएगा
कुछ रहेगा या कुछ भी नहीं बचेगा
क्या मैं इन सवालों के जवाब भी चाहती हूँ?
क्या मुझे सचमुच कोई फर्क पड़ता है
कुछ नहीं रह जाने से?
गोधूलि के आसमान के नीचे खड़ी रही
मेरे अस्तित्व के रेशे-रेशे
अक्षर बन उस आसमान की लाली में खोते रहे
मेरे शरीर से, मेरी आत्मा से
पृथक होते रहे
ये अक्षरों के रेशे
साँसों से निकलते रहे,
आँखों से बहते रहे
शरीर के पोरों से
कभी थकान तो कभी आक्रोश बन
रिसते रहे
मैं नहीं जानती
अक्षरों के पीछे क्या है
जब ये सारे रेशे निकल जाएंगे
तो क्या रह जाएगा
कुछ रहेगा या कुछ भी नहीं बचेगा
क्या मैं इन सवालों के जवाब भी चाहती हूँ?
क्या मुझे सचमुच कोई फर्क पड़ता है
कुछ नहीं रह जाने से?
