Wednesday, May 13, 2015

'Paash' ke liye - II

शब्द जो उखड़ी हुई साँस के ठहर जाने पर निकलते हैं 
जो विप्लव के शांत होने पर हवा में बहते हैं 
जो आराम कुर्सी पर बैठे पारितोषिक की बाट जोहते हैं 
जो व्यष्टि से समष्टि की यात्रा व्याकरण की परिधि पर तय करते हैं - 
कविता नहीं होते!

Friday, May 8, 2015

कोई कहानी
कलम से निकलकर
अजनबी हो जाती है
ये तो मालूम था
ये अंदाज़ा नहीं था कि
डरावनी भी हो जायेगी

कैसे लिखूँ तुम्हारी कहानी
तुम, जो दिल के इतने करीब हो
तुम, जिसके साथ रोज़ हँसती, बोलती
झगड़ती रही
तुमसे छेड़खानी करती रही

किन शब्दों में बयान करूँ
मेरे और तुम्हारे
जीवन के बीच का ये फ़ासला
जो अचानक मेरी नज़रों के सामने
सवाल बन खड़ा हो गया है

किन शब्दों में लिखूँ
कि तुमने ये फ़ासला कैसे तय किया
रेल की पटरी पर लड़कियों के कपडे डाल
खुद को बेचने से लेकर
बोर्ड रूम में बड़े-बड़े निर्णय लेने का

मेरा शब्दकोष शायद
मेरे अनुभवों की तरह सीमित नहीं
पर तुम्हारी कहानी के शब्द
गले में अटक से जाते हैं

मुझे अपनी कलम पर
तुम्हारे अतीत को लिखने का
बोझ नहीं चाहिए
अपने दिल पर भी नहीं 

Friday, March 20, 2015

मैं आँखें बंद कर, बाँहें फैलाए
गोधूलि के आसमान के नीचे खड़ी रही
मेरे अस्तित्व के रेशे-रेशे
अक्षर बन उस आसमान की लाली में खोते रहे
मेरे शरीर से, मेरी आत्मा से
पृथक होते रहे

ये अक्षरों के रेशे
साँसों से निकलते रहे,
आँखों से बहते रहे
शरीर के पोरों से
कभी थकान तो कभी आक्रोश बन
रिसते रहे

मैं नहीं जानती
अक्षरों के पीछे क्या है
जब ये सारे रेशे निकल जाएंगे
तो क्या रह जाएगा
कुछ रहेगा या कुछ भी नहीं बचेगा
क्या मैं इन सवालों के जवाब भी चाहती हूँ?
क्या मुझे सचमुच कोई फर्क पड़ता है
कुछ नहीं रह जाने से?