Sunday, February 2, 2014

लेखनी

मेरी लेखनी से इतना सारा सच न माँग
उलझन में पड़ जाती है

व्यक्ति का दर्द देखती है
समुदाय की कथा सुनाती है

जिन शब्दों को समुदाय ने गढ़ा
जिनके अर्थ निर्धारित किये,
उन शब्दों को दुहराती है

जब शब्दों में
दर्द पूरा नहीं पड़ता
उनकी लोरी बना कर
चेतना को सुलाती है

मेरी लेखनी से इतना सारा सच न माँग
उलझन में पड़ जाती है

पूछते हो, अपने शब्द क्यों नहीं गढ़ती?
अपना दर्द क्यों नहीं लिखती ?

मेरा दर्द तो
अलग-अलग समुदायों के
नए-नए शब्दों में बँटता गया
छितराता गया

मेरी लेखनी तुमसे
किसी सच का वादा नहीं करती
बस इस छितराये हुए दर्द को
शब्दों में समेटती जाती है