Thursday, June 27, 2013

कई बार सपने में 
ज़िन्दगी से कुछ गायब सा हो जाता है 
सपने में ही हाथ-पैर मारती हूँ 
समझने की कोशिश करती हूँ 
कि जागती आँखों से जो ज़िन्दगी 
perfect मालूम पड़ती थी 
अचानक इतनी उलझ कैसे गयी 
कौन सी कड़ी, कहाँ से टूट कर 
कहाँ गुम हो गयी 
एक छोर को दूसरे से 
मिलाने की कोशिश में 
रात बीत जाती है
और सपना भी 
थक कर, हार कर 
जब ज़िन्दगी के compromise को 
स्वीकार कर लेती हूँ 
तब सुबह की पहली धूप 
आँखों पर पड़ती है