कई बार सपने में
ज़िन्दगी से कुछ गायब सा हो जाता है
सपने में ही हाथ-पैर मारती हूँ
समझने की कोशिश करती हूँ
कि जागती आँखों से जो ज़िन्दगी
perfect मालूम पड़ती थी
अचानक इतनी उलझ कैसे गयी
कौन सी कड़ी, कहाँ से टूट कर
कहाँ गुम हो गयी
एक छोर को दूसरे से
मिलाने की कोशिश में
रात बीत जाती है
और सपना भी
थक कर, हार कर
जब ज़िन्दगी के compromise को
स्वीकार कर लेती हूँ
तब सुबह की पहली धूप
आँखों पर पड़ती है
