Tuesday, November 22, 2011

किसी सुदूर स्वप्न की
आँखें चुरा कर
मैंने तुम्हे देखा
तुम्हे समझा
तुम्हारे अस्तित्व में स्वयं को
विलीन कर दिया
किसी दूरस्थ पीड़ा की नाव बना 
अपनी कहानियों में
उतारती रही
डुबोती रही

जाने किस पल में
मेरी आँखें मानो
मुझसे ही पराई हो गयीं
मेरी कहानियों ने मुझसे
बातें करनी बंद कर दी

Sunday, November 13, 2011

न जाने किस घड़ी में
शब्दों की आत्मा मर गयी 
न जाने किस क्षण में 
सार असार हो गया 
शब्दों ने अर्थ की परिभाषा बदल दी
अव्यक्त को नग्न किया 
वेदना को तिरस्कृत किया
****
मृत्ति और नभ,
ज्ञान और अज्ञान
के मध्य फँसा अस्तित्व
वीभत्स से भीत
करुणा से विगलित
अनंत की कामना में
अज्ञात की ओर बढ़ता
शब्दों का अस्तित्व