Thursday, October 13, 2011

न जाने इतिहास के कौन से छोर पर 
जीवन की धारा विभक्त हुई
और एक तरफ सभ्यता चली गयी 
दूसरी तरफ मात्र शब्द रह गए 

शब्दों ने अपने लिए 
शब्दों की एक नयी सभ्यता निर्मित कर ली
शब्दों की संवेदना, शब्दों के सम्बन्ध 
शब्दों का समाज और शब्दों का अस्तित्व 

शब्दों ने उस सुदूर सभ्यता का मूल्यांकन भी किया
अपने निबंधनों पर
अपनी सीमित परिधि में 
अपने कल्पित तर्कों से 

कभी अज्ञान के मरघट में 
उपहास का अलाव जलाया
तो कभी घृणा की मिटटी में 
शोषण के बीज बोये

यहाँ शब्दों के प्रपंच से दूर सभ्यता
प्रकृति के अंचल में फल फूल रही थी
जीवन के रस का वितरण कर रही थी 
वहाँ शब्दों का विस्तार गहराता रहा

लिप्साजन्य वस्त्राभूषणों से मंडित
तर्क रुपी शस्त्रास्त्रों से सज्जित
शब्दों का साम्राज्य 
सभ्यता के द्वार पर आकर खड़ा हो गया

प्रकृति का अंचल मानो 
लोलुपता के दैत्य के समक्ष छोटा पड़ गया
सभ्यता ने युगों से जिस संसृति को पोषित किया 
शब्दों ने उसकी नींव को विषाक्त कर दिया 

प्रश्न आधिपत्य का नहीं
प्रश्न अस्तित्व का है
सृष्टि के अस्तित्व का 
सभ्यता के और शब्दों के अस्तित्व का