Tuesday, November 30, 2010

मार्च 2006

Sunday, August 22, 2010

हर मोड़ पे सर्द चेहरे
और सर्द चेहरों की सर्द कहानियाँ...
मुझे फिर कोई ओजस्वी कहानी सुनाओ
की वक़्त थम जाए
और अपनी दिशा बदलने की ज़िद कर बैठे....
मैंने अपनी मिट्टी से कुछ नहीं माँगा
सिवाए इसके कि
वो मेरी पहचान बने...
मेरे आंसुओं से सिंचती रहे
मेरी हंसी में खिलती रहे
मेरी आग में सिकती रहे

Sunday, April 18, 2010

इस गीली धरती के ऊपर
एक हवा गुज़रती जाती है
जाने किस देस से आई है
जाने क्यूँ हमको भाती है
****

Sunday, March 21, 2010

सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया।
सच,
तुम्हारी कल्पना का धनुर्धर योद्धा।
सच,
अवध्य, अजेय।
तुम्हारी पलकों पर बिखरी,
मधुर स्मृति सा निर्मल,
प्रांजल, निष्कलंक सच।
सच,
जिसकी ज्योति को
तुमने धूमिल होते नहीं देखा,
जिसकी तेज धार पर चलकर
तुमने सैकड़ों अग्निपरीक्षायें दी,
जिसके कोदंड की शक्ति ने
तुम्हे नव-युग प्रणेता बना दिया।
****
सच की उस एक मूर्त्ति को
तुमने देखा, जाना
और प्रतिस्थापित किया
तुम नयी आँखें लगा कर
देखती हो दूर
जाने किस क्षितिज के पार ।
सूर्य ने खोली नहीं है आँख
अपनी लाल पलकें मूँद कर
वह मंद मुस्काता खड़ा है ।
और तारे ऊंघते से दीखते हैं
चाँद कि डोली सजाये
ले रहे तुमसे विदा हैं।
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कुछ नया सा भर रहा है
आज साँसों में।
पिघलती ओस सा
सब कुछ पिघलता दीखता है।
खोल दो गाँठें सभी
और दर्द को बन नीर
मन के पोर से बहने दो अब,
कि अब नहीं रोके रुकेगा
ये विकट उन्माद
और अब नहीं थामे थमेगा
मौन करुणा की दुशाला ओढ़ बैठा
फिर किसी प्लावित व्यथा का नाद।

Tuesday, January 19, 2010

मन के किसी उदास कोने में
जाने कौन सी धूप पड़ी...
जाने कितने अचीन्हे एहसासों को जगा गयी
मन को एक आदिम पीड़ा कि याद दिला गयी

Friday, January 8, 2010

आज हमने कुछ बोलते हुए बेज़ुबान देखे
अपनी हालत से ना वाकिफ़ परेशान देखे