जाने किस छोर की तलाश में
मन यहाँ वहाँ भटकता रहा...
तेरे दरस की आस लिए
अनजाने रास्तों पे चलता रहा...
***
मेरी आँखों का आंसू
अब छलकना नहीं चाहता...
मेरे अंतस की पीड़ा को अब
मेरे मन से प्रीत हो गयी है...
***
कुछ बैठा बैठा सा लगता है अन्दर
कुछ जाना पहचाना
लेकिन फिर भी पराया...
Friday, December 18, 2009
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