इस वृत्त के पार क्या कोई विकल प्रकाश है
जो प्रीत की टहनी से छन कर
है बरसना चाहता
कहता है चुपके से मेरे मन - प्राण में
आकर समाकर
भूल से ही सही
अब तो तोड़ दो इस वृत्त को
और मूँद कर आँखें
खड़ी हो जाओ विभु की नीलिमा में
Monday, April 6, 2009
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