शब्द मिलते जो
दिशा भी ढूँढ लाती मैं कहीं से...
यूँ विहग सी
भीत, व्याकुल चुप न रहती लेखनी भी...
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क्यूँ धरा की कुक्षि से
अब जन्म लेता तिमिर है
क्यूँ नहीं अब परशु ले कर
निकलता कोई सूर्य है....
Saturday, June 21, 2008
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